कुछ विश्लेषक नियो वेव थ्योरी को इलियट वेव थ्योरी का नया रूप मानते हैं, जबकि अन्य इसे मूल सिद्धांत का नया संस्करण मानते हैं। मैं बाद के दृष्टिकोण से ज्यादा सहमत हूं। हालांकि ग्लेन नीली की थ्योरी इलियट वेव से अलग है, लेकिन इसमें बाजार विश्लेषण के उन्हीं मौलिक सिद्धांतों को अपनाया जाता है।
इस लेख में NeoWave थ्योरी के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिसमें इलियट वेव पद्धति से इसके अंतर स्पष्ट किए गए हैं। हम पैटर्न की व्याख्या, निर्माण और बाजार पूर्वानुमान की प्रक्रिया को भी समझेंगे। साथ ही, हम ट्रेडिंग में नियो वेव के उपयोग और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से इस पद्धति की सटीकता का भी मूल्यांकन करेंगे।
इस आर्टिकल में निम्नलिखित विषय शामिल हैं:
- अहम जानकारी
- NeoWave थ्योरी के बारे में जानकारी
- NeoWave थ्योरी क्या है?
- इलियट वेव और नियो वेव में क्या अंतर है?
- NeoWave थ्योरी में वेव कितने तरह के होते हैं
- नियो वेव कैसे बनाएं?
- तरंग लंबाई अनुपात के नियम
- चैनल
- ट्रेडिंग में नियो वेव का इस्तेमाल कैसे करें?
- निष्कर्ष
- नियो वेव थ्योरी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अहम जानकारी
- NeoWave थ्योरी इलियट वेव सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या है, जिसे राल्फ नेल्सन इलियट ने विकसित किया था।
- इलियट वेव थ्योरी के अलावा, NeoWave अपने विश्लेषण को कठोर गणितीय सिद्धांतों और वेक्टर भौतिकी पर आधारित करता है, जिससे इलियट वेव दृष्टिकोण की मुख्य कमियों को दूर करने में मदद मिलती है, जिसमें इसकी व्यक्तिपरकता और बाजार की अलग-अलग व्याख्याओं की संभावना शामिल है।
- NeoWave में कीमत में उतार-चढ़ाव की मौलिक इकाई को मोनोवेव कहा जाता है। मोनोवेव को मिलाकर खंड बनाए जाते हैं, जिससे इन्हें मिलाकर जटिल पैटर्न बनाए जाते
- राल्फ नेल्सन इलियट के मौलिक सिद्धांतों के अनुरूप, NeoWave थ्योरी कीमत में उतार-चढ़ाव को आवेगों और सुधारों में वर्गीकृत करता है।
- NeoWave थ्योरी में वेवलेन्थ अनुपातों के नियम सबसे ज़रूरी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन अनुपातों के आधार पर प्राथमिक चार्ट पैटर्न बनते हैं, जिनमें बाद में आवेगों और सुधारों के निर्माण से जुड़े नियमों, फिबोनाच्ची अनुपातों और ग्लेन निली की ओर से निर्धारित अन्य पैटर्न के अनुसार सुधार किया जाता है।
- NeoWave थ्योरी खास तौर पर बंद उपभोग चक्र और स्थिर मांग वाले कमोडिटी बाजारों में प्रभावी है।
NeoWave थ्योरी के बारे में जानकारी
1980 के दशक के आखिर में ग्लेन नीली ने वित्तीय विश्लेषक के तौर पर अपना करियर शुरू किया। तेल कंपनी में काम करने के दौरान, उन्होंने पारंपरिक इलियट वेव विश्लेषण पद्धति को अपनाया। स्टॉक ट्रेडिंग में गहन रुचि के चलते, नीली ने 2,000 डॉलर में तैयार ट्रेडिंग सिस्टम खरीदा, जिसे उस समय भारी रकम माना जाता था।
काफी मुनाफ़ा कमाने के बजाय, नए विश्लेषक ने अनुभव हासिल किया और यह समझा कि जटिल और महंगी ट्रेडिंग प्रणालियों का उपयोग करना बाजार सिद्धांतों की व्यापक समझ के बिना अप्रभावी है। नीली ने बाद के वर्षों को खुद से अध्ययन करने, मार्केट रिसर्च करने और अपने अर्जित ज्ञान को व्यवस्थित करने पर बिताया।
आखिरकार, नीली ने यह समझा कि विविध बाजार विश्लेषण विधियों को शामिल करने वाली व्यापक प्रणाली ज़रूरी थी। उनके विचार में, सबसे आशाजनक विधि इलियट वेव थ्योरी थी। हालांकि, उन्होंने देखा कि पारंपरिक इलियट वेव सिद्धांत में कई खामियां थीं और इसमें सुधार की आवश्यकता थी। उन्होंने इलियट वेव थ्योरी की प्राथमिक खामी को इसकी कई व्याख्याओं और व्यक्तिपरकता के प्रति संवेदनशीलता को माना, जिससे यह विधि कठोर और अविश्वसनीय बन जाती थी। इसी कारण, निली ने अपनी संरचित तकनीकी बाजार विश्लेषण पद्धति विकसित की।
इसका नतीजा नियो वेव थ्योरी था, जिसे ट्रेडिंग में विषयपरक दृष्टिकोण के प्रभाव को कम करने के लिए विकसित किया गया। इस सिद्धांत में इलियट थ्योरी के तत्वों, जैसे कि फिबोनाची अनुपात और अनुक्रम के साथ-साथ वेक्टर भौतिकी को जोड़ा गया है, ताकि बाजार विश्लेषण की सटीकता को बढ़ा सकें। परिणामस्वरूप, NeoWave थ्योरी पारंपरिक इलियट विधि के नए संस्करण के रूप में सामने आया है, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव का विश्लेषण ज्यादा स्पष्ट और संरचित तरीके से किया जा सकता है।
NeoWave थ्योरी क्या है?
इसमें NEoWave या नीली एक्सटेंशन ऑफ वेव थ्योरी, इलियट वेव थ्योरी के समान दृष्टिकोण को अपनाया जाता है, जिसमें फिबोनाची अनुक्रमों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि दिशात्मक कीमत में उतार-चढ़ाव में अनुपातों की पहचान कर सकें। इस पद्धति से ट्रेडर्स को संभावित पिवट पॉइंट और रुझान जारी रहने का संकेत मिलता है, जिससे उनकी ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति और ज्यादा सटीक बनती है।
नीली के सिद्धांत में मूल्य संरचनाओं की अवधारणा अहम घटक है, जिससे कीमत में भावी उतार-चढ़ाव की भविष्यवाणी करने में मदद मिलती है।
किसी कमोडिटी की कीमत उसके पहली की कीमत में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है और लंबी अवधि में इसकी बढ़ने की संभावना बनी रहती है। विश्लेषक ने बताया कि पुराने डेटा से प्राप्त मूल्य अनुपातों का उपयोग करके कीमत में भावी उतार-चढ़ाव का सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और ज्यादा सोच-समझकर ट्रेडिंग से जुड़े फैसले लिए जा सकते हैं।
इसके अलावा, NeoWave प्रणाली में वेक्टर फिजिक्स के सिद्धांतों को अपनाया जाता है, ताकि दिशा संबंधी कीमत में उतार-चढ़ाव का विश्लेषण किया जा सके। नीली की ट्रेडिंग प्रणाली में कीमत में उतार-चढ़ाव की दिशा और तीव्रता को ध्यान में रखा जाता है, जिससे रुझानों का ज्यादा सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और NeoWave पैटर्न का निर्माण किया जा सकता है। इससे व्यक्तिगत पक्षपात और अशुद्धियों को समाप्त करने में सहायता मिलती है।
इसके फ़ायदे के बावजूद, NeoWave को सार्वभौमिक प्रणाली नहीं माना जा सकता है। नीली ने इस बारे में बताया कि सफल प्रणाली लागू करने के लिए बाजार को विशिष्ट शर्तों को पूरा करना चाहिए। यह खास तौर पर बंद उपभोग चक्र और स्थिर मांग वाला कमोडिटी बाजार होना चाहिए, जहां प्रगतिशील मूल्य पैटर्न सबसे स्पष्ट रूप से देखे जा सकें। उदाहरण के तौर पर, तेल, धातु, चीनी, आदि।
इलियट वेव और नियो वेव में क्या अंतर है?
नियो वेव थ्योरी को विस्तार के रूप में विकसित किया गया था, जिसमें नीली ने इलियट के सिद्धांत की कमियों को दूर करने का प्रयास किया था। पारंपरिक वेव थ्योरी के साथ बड़ी समस्या यह है कि इसमें बहुत सारे नियम या पैटर्न नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप अस्पष्ट व्याख्याएं और विश्लेषणात्मक गलतियां हो सकती हैं। ग्लेन नीली ने नियमों की सूची का विस्तार किया, जिससे उनकी प्रणाली ज्यादा भरोसेमंद हो गई।
जिस तरह पैटर्न बनाया जाता है, उससे यह भी पता चलता है कि यह सिद्धांत इलियट वेव थ्योरी से किस तरह अलग है। पारंपरिक सिद्धांत के अनुसार, वेव संरचनाएं फिबोनाची अनुपात और मौलिक मूल्य पैटर्न पर आधारित होती हैं, जिन्हें ग्राफिकल रूप में दिखाकर विश्लेषण को सरल बनाया जाता है।
वेक्टर फिजिक्स के पहलुओं को जोड़कर, ग्लेन नीली ने ग्राफिकल पैटर्न बनाने की प्रक्रिया में सुधार किया, जिससे व्यक्तिपरक मॉडल सटीक और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण प्रक्रिया में बदल गया।
NEoWave की विशिष्टता यह है कि यह प्राइस पैटर्न के निर्माण और पूर्णता के लिए निश्चित समय-सीमा लागू नहीं करता। हालांकि, नीली समय कारकों को ध्यान में रखते हैं, लेकिन वे इसे सख्त ट्रेडिंग नियमों के रूप में नहीं देखते।
NeoWave थ्योरी में वेव कितने तरह के होते हैं
संक्षेप में, ग्लेन नीली ने तरंगों को दो प्रकारों में विभाजित किया है:
- मोनोवेव कीमत में सबसे सरल दिशात्मक उतार-चढ़ाव को दिखाता है।
- पॉलीवेव NEoWave ग्राफिक पैटर्न होते हैं, जिसें कई छोटी वेव की श्रृंखला शामिल होती है।
बाजार विश्लेषण की बारीकियों को समझते हुए, हम पॉलीवेव पर ध्यान केंद्रित करेंगे। यह इलियट और नीली के सिद्धांतों के अनुरूप बाजार पैटर्न को दर्शाते हैं। अलग-अलग वेव और उनके निर्माण के नियमों को ध्यान में रखते हुए, हमारी चर्चा पॉलीवेव पर आधारित होगी।
संरचनात्मक दृष्टिकोण से, पॉलीवेव में छोटी पॉलीवेव की श्रृंखला या निकटतम रूप में, मोनोवेव शामिल हो सकती हैं। पॉ इसकी नेस्टेड संरचना ग्राफिकल पैटर्न निर्माण की सटीकता को प्रमाणित करती है। नियो वेव सिद्धांत में, आवेग और सुधार दो तरह के वेव होते हैं। आवेग की प्रारंभिक वेव में एक आवेग संरचना होनी चाहिए, जबकि बाद की तरंग में सुधारात्मक संरचना होनी चाहिए।
नियो वेव थ्योरी में आवेगों की विशेषताएं
आवेग तरंगें बाजार की दिशा निर्धारित करने वाली प्रेरक तरंगे होती हैं। इनकी निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं:
- पांच तरंगों की संरचना में तीन चालित तरंगें और दो सुधारात्मक तरंगें होती हैं। आवेग तरंगें तब बनती हैं, जब बाजार में बढ़ोतरी होने की संभावना होती है, जिससे कीमत में सबसे ज्यादा उतार-चढाव होता है।
- आवेग तरंग की दिशा हमेशा रुझान की दिशा से मिलती-जुलती है। प्राइस मूवमेंट वेक्टर के कोणीय झुकाव के अनुसार, इसे ऊर्ध्वगामी या निम्नगामी रूप में इसकी पहचान की जा सकती है।
- आवेग तरंगों के अपने विशिष्ट पैटर्न होते हैं। इनकी प्रारंभिक संरचना से रुझान की पुष्टि होती है, जबकि पूरा होने पर बाज़ार में ज्यादा बदलाव होने का संकेत या रुझान में उलटफेर होने का संकेत मिलता है या बाजार में सुधार शुरू होता है।
नियो वेव थ्योरी में सुधार की विशेषताएं
सुधार तब होता है, जब प्रारंभिक दिशा में आगे बढ़ना बाजार की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होता। ये आमतौर पर तब होता है, जब बाजार में ज्यादा खरीदारी होती है या जब कीमत किसी मजबूत रजिस्टेंस लेव को पार करती है। सुधार आवेगों के बीच बनने वाले नियो वेव प्राइस पैटर्न होते हैं, जिससे खरीदारों और विक्रेताओं की अपेक्षाओं और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।
संरचना के आधार पर, सुधारों को आम तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- सरल सुधार तीन से पांच भागों से मिलकर बने होते हैं। इस तरह की संरचनाओं में फ़्लैट पैटर्न, ज़िगज़ैग और ट्रायंगल पैटर्न शामिल हैं।
- तरंगों को जोड़कर किए गए मूलभूत सुधारों के संयोजन को जटिल सुधार कहा जाता है।
नियो वेव कैसे बनाएं?
नियो वेव बनाते समय तरंगों की संरचना को समझना और उनके निर्माण के मूल सिद्धांतों का पालन करना ज़रूरी है। इसके अलावा, रणनीति की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए समय, कीमत और संरचनात्मक कारकों पर ध्यान देना ज़रूरी है। इस दृष्टिकोण से किसी को जटिल बाजार पैटर्न की पहचान करने और कीमत में भावी उतार-चढ़ाव का पूर्वानुमान लगाने में मदद मिलती है। आइए नियो वेव पैटर्न की संरचना का विश्लेषण करें।
आवेग
जब बाजार मौजूदा रुझान के अनुसार आगे बढ़ता है, तो आवेग पैटर्न बनता है, जिसमें पाँच खंड होते हैं। इस संरचना में पहली, तीसरी और पाँचवीं तरंगें प्रेरक होती हैं और ये आवेगात्मक होती हैं। अगर तरंगें जटिल हों, तो हरेक खंड में भी पांच तरंग संरचना होती है, जबकि दूसरी और चौथी तरंगें सुधारात्मक होती हैं।
आवेग पैटर्न कैसे बनाएं:
- पहली तरंग मुख्य मूल्य प्रवाह की दिशा में बनती है। अर्थात अगर हम उर्ध्वगामी रुझान की बात कर रहे हैं, तो पहली तरंग ऊपर की दिशा में बढ़ेगी।
- दूसरी तरंग सुधारात्मक तरंग होती है और इसलिए यह विपरीत दिशा में बनती है। यह पहली तरंग के प्रारंभिक बिंदु तक वापस नहीं जा सकती।
- तीसरी तरंग आवेग तरंग होती है। यह रुझान की दिशा में बनती है। यह सभी आवेग तरंगों में सबसे छोटी नहीं हो सकती और यह दूसरी तरंग से लंबी होनी चाहिए।
- चौथी तरंग एक सुधारात्मक तरंग होती है। यह मुख्य रुझान के विपरीत दिशा में चलती है। यह तीसरी तरंग को पूरी तरह से वापस नहीं ला सकती।
- पांचवीं तरंग का आकार हमेशा चौथी तरंग के 38.2% से ज्यादा होता है। यह आमतौर पर चौथी तरंग के 100% लंबाई को पार कर जाती है।
- अगर पांचवीं तरंग तीसरी तरंग के शीर्ष तक नहीं पहुंचती, तो इसे विफल या छोटी तरंग मानी जाती है।
उपरोक्त चार्ट पांच तरंग वाले आवेग पैटर्न का उदाहरण दिखाता है।
सुधार
ग्लेन नीली के अनुसार, अगर आवेग निर्माण के नियमों में से कोई एक भी पूरा नहीं होता, तो इसे सुधारात्मक तरंगों के रूप में देखा जाना चाहिए। नियो वेव थ्योरी में सुधारात्मक तरंगों के लिए भी विशिष्ट नियम होते हैं, जिससे बाजार विश्लेषण को ज्यादा सटीक बनाए रखते हैं। आइए इन नियमों का विश्लेषण करें
समतल पैटर्न।
- यह तीन तरंगों (A, B, और C) से मिलकर बनी होती है और इससे संकेत मिलता है कि मुख्य रुझान संभवतः जारी रहेगा।
- तरंग B आमतौर पर तरंग A के 90-110% तक लौटती है। अगर यह विस्तारित समतल पैटर्न हो, तो सीमा 125% तक पहुंच सकती है। इस विशेषता के कारण समतल पैटर्न की आसानी से पहचान की जा सकती है।
- जहां तरंग A की समाप्ति सीमा होती है, वहां तरंग C उस स्तर को पार कर जाती है।
- आमतौर पर, समतल पैटर्न के भीतर कोई प्रमुख रुझान नहीं दिखता।
- तरंग C पिछले नियम का अपवाद हो सकती है। इसमें अक्सर पांच-तरंग वाली संरचना होती है और इसमें तेज़ी या मंदी की ओर तीव्र रुझान देखा जा सकता है।
- तरंग की उप-संरचना आमतौर पर 3–3–5 पैटर्न के अनुरूप होती है।
पिछले उदाहरण की आवेग तरंग के बाद समतल सुधार होता है। उपरोक्त चार्ट से पता चलता है कि यह चैनल के भीतर सीमित है।
जिंगजैग पैटर्न।
- नियो वेव थ्योरी में मूल सुधारात्मक पैटर्न के प्रकार से मुख्य रुझान से अस्थायी वापसी का संकेत मिलता है।
- यह तीन-तरंग वाली संरचना को दिखाता है, जिसे A, B और C के रूप में दिखाया किया जाता है, जिनकी संरचना सामान्यतः 5–3–5 पैटर्न में होती है।
- ज़िगज़ैग पैटर्न में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखा जाता है, जहां A और C तरंगें प्रेरक होती हैं, जबकि B तरंग सुधारात्मक होती है।
- तरंग B की सीमा शायद ही कभी तरंग A के 61.8% से ज्यादा होती है।
- तरंग C की सीमा आमतौर पर तरंग A के बराबर या उससे ज्यादा होती है।
ज़िगज़ैग पैटर्न का उदाहरण उपरोक्त चार्ट में देखा जा सकता है।
ट्रायंगल पैटर्न।
- यह A, B, C, D और E नामक पांच खण्डों से मिलकर बना होता है, जिन्हें पैटर्न के उच्चतम और निम्नतम बिंदुओं को जोड़ने वाली दो रेखाओं के बीच रखा जा सकता है।
- यह तरंग संरचना 3–3–3–3–3 पैटर्न के अनुसार बनी होती है।
- इस पैटर्न से संकेत मिलता है कि बाजार संतुलन की स्थिति में है। त्रिभुज पैटर्न पूरा होने के बाद, कीमत नई आवेग तरंग बनाकर रुझान के अनुसार आगे बढ़ती है।
- आमतौर पर यह किसी व्यापक संरचना के अंतिम चरण से ठीक पहले बनता है और इससे रुझान के धीमे होने का संकेत मिलता है।
उपरोक्त चार्ट में त्रिभुज पैटर्न का उदाहरण देखा जा सकता है।
संरचनात्मक लेबल
ग्लेन नीली ने चार्ट पर अलग-अलग पैटर्न को समझना आसान बनाने के लिए संरचनात्मक संकेतक या लेबल बनाए। इन लेबल का इस्तेमाल चार्ट पर किसी भी पैटर्न का वर्णन करने के लिए किया जा सकता है। आमतौर पर इनका वर्गीकरण आधारभूत और स्थित संरचना लेबल में किया जाता है।
मूल संरचना लेवल:
- ":5" वह कोई भी आवेग तरंग है, जो नियो वेव संरचना में अंतिम तरंग नहीं होती।
- उसका सटीक स्थान तय न होने पर ":3" ज़िगज़ैग, फ्लैट, या ट्रायंगल पैटर्न की कोई भी तरंग होती है।
- ":3" को रेखांकित करने से यह पता चलता है कि यह किसी जटिल सुधार संरचना (फ्लैट, ज़िगज़ैग, या ट्रायंगल) में अंतिम तीन तरंगें हैं।
स्थित संरचना लेबल:
- ":F3" प्रारंभिक तीन तरंगों को दिखाता है। यह जटिल सुधार या दो आवेग तरंगों के बीच बनने वाले सुधार का पहला सेगमेंट होता है।
- ":c3" बीच की तीनों तरंगों को दिखाता है। ये तरंगें पैटर्न के केंद्रीय भाग में स्थित होती हैं; यानी, प्रारंभिक या आखिरी नहीं हो सकतीं।
- x-वेव पोजीशन में ":c3" बीच की तीनों तरंगों को दिखाता है। यह आसान इलियट प्राइस पैटर्न से संबंधित होता है।
- ":sL3" अंतिम तीन तरंगों से पहले आने वाली तीन तरंगों को दिखाता है। तीन खंडों से मिलकर बनी यह तरंग हमेशा ":L3" लेबल वाले अंतिम तीन खंडों से पहले आती है।
- ":L3" अंतिम तीन, संरचना की अंतिम तीन-खंड वाली तरंग होती है।
- ":s5" जटिल या "विशेष" पाँच-तरंग वाली संरचना को दिखाता है। यह जटिल इलियट संरचना का हिस्सा हो सकता है या किसी आवेग की तीसरी तरंग हो सकती है, जिसमें पांचवां खंड विफल या छोटा हो जाता है।
- ":L5" अंतिम तरंग है। यानी यह अंतिम तरंग संरचना है।
तरंग लंबाई अनुपात के नियम
तरंग लंबाई अनुपात के नियमों को लागू करने के लिए, मोनोवेव को पहले चार्ट पर दिखाया जाना चाहिए। पहली मोनोवेव को m1, अगली को m2, m3 और इसी क्रम में नाम देना चाहिए। अतिरिक्त नियमों को निर्धारित करने के लिए, उनसे पहले की मोनोवेव, जैसे कि m0, m(-1), m(-2), आदि के रूप में अंकित करना चाहिए।
उपरोक्त चार्ट दैनिक न्यूनतम और उच्चतम स्तर के आधार पर मोनोवेव संरचना का उदाहरण दिखाता है। ट्रेडिंग डे के अंतराल को लंबवत रेखाओं से दिखाया गया है।
नियो वेव थ्योरी के मूल नियम m1 और m2 की तरंग लंबाइयों के अनुपात पर आधारित होते हैं:
- m2 की तरंग लंबाई m1 की लंबाई के 38.2% से कम है;
- m2 — m1 का 38.2–61.8%;
- m2 —m1 का 61.8%
- m2 — m1 का 61.8% से लेकर 100% तक (शामिल नहीं);
- m2 — m1 का 100% (शामिल) से लेकर 161.8% (शामिल नहीं) तक;
- m2 — m1 का 161.8% (शामिल) से लेकर 261.8% (शामिल नहीं) तक;
- m2 — m1 की तुलना में 261.8% से ज्यादा।
उपरोक्त चार्ट पर, मोनोवेव m2, m1 की 61.8% से 100% सीमा के भीतर होती है, इसलिए चौथा नियम लागू होता है। नियम 4 की पुष्टि करने के लिए, आइए मोनोवेव m0 और m1 का अनुपात निर्धारित करें।
m0, m1 की 38.2% से 100% सीमा के भीतर है, इसलिए शर्त (b) लागू होगी। अब, आइए m3 और m2 के अनुपात का विश्लेषण करें और श्रेणी चुनें।
m3 मोनोवेव की लंबाई, m2 की 100% से 161.8% सीमा के भीतर है। यह दिखाता है कि हमारे मामले में श्रेणी (i) लागू होती है।
प्रारंभिक बिंदु m3 (समय इकाई जोड़ने पर) का स्तर इसकी संरचना अवधि तक हासिल नहीं किया जाता है। इसलिए हमने m1 के अंतिम बिंदु पर ":F3/:c3/:s5" रखा है।
तरंग m0 की अवधि, मोनोवेव m(-1) और m1 की लंबाइयों से कम है, इसलिए संरचनात्मक सूची से ":s5" लेबल हटा देना चाहिए।
इसी तरह, ट्रेडर सभी मोनोवेव का विश्लेषण करते हैं और अपने अध्ययन के आधार पर इलियट वेव पैटर्न की सटीक संरचना विकसित करते हैं, जिससे इंपल्स, ज़िगज़ैग, ट्रायंगल और फ्लैट पैटर्न जैसे नियो वेव पैटर्न बनते हैं।
चैनल
तरंग की लंबाई के अनुपात के नियमों और जटिल संरचना बनाने के नियमों के अलावा, नियो वेव थ्योरी में चैनल का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि संरचनाओं की पुष्टि और संभावित पिवट पॉइंट निर्धारित की जा सके। आइए अलग-अलग तरह की संरचनाओं के लिए चैनल बनाने से जुड़े नियमों को समझें।
आवेग तरंगों के लिए चैनल निर्माण की प्रक्रिया
इलियट के अलावा, नियो वेव से पारंपरिक चैनल बनाने का सुझाव नहीं मिलता है। ग्लेन नीली ने पैटर्न के भीतर स्थित दो समानांतर रेखाओं के बजाय दूसरी और चौथी तरंगों के निम्नतम बिंदुओं से होकर सपोर्ट लेवल बनाने का सुझाव दिया।
चैनल सीमाएं दो चरणों में बनाई जाती हैं, जिसमें इन बिंदुओं के माध्यम से संयोजक रेखा खींची जाती है:
- तरंग 1 की शुरुआत और तरंग 2 का समापन।
- तरंग 2 और तरंग 4 का समापन।
प्रारंभिक चैनल का निर्माण दूसरी तरंग की शुरुआत के बाद शुरू होता है। इसके बनते समय, जैसे-जैसे दूसरी तरंग नए निम्न स्तरों तक पहुंचती है, चैनल रेखा का कोण बदल सकता है।
तीसरी तरंग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, चैनल को समायोजित किया जाना चाहिए। इस चरण में, सपोर्ट लेवल तरंग 2 और तरंग 4 के अंतिम बिंदुओं का इस्तेमाल करके निर्धारित किया जाना चाहिए। जब चौथी तरंग अपने निम्न स्तर तक पहुंचती है और पाँचवीं तरंग बनना शुरू होती है, तब इंपल्स चैनल को पूरा माना जा सकता है।
उपरोक्त चार्ट प्रारंभिक चैनल को दिखाता है, जिसे तरंग 1 की शुरुआत और तरंग 2 के अंतिम बिंदु के माध्यम से खींचा गया है।
चार्ट समायोजित चैनल को दिखाता है, जिसे तरंग 2 और तरंग 4 के अंतिम बिंदुओं का उपयोग करके खींचा गया है। दोनों बिंदु को नीले वृत्तों से दिखाया गया है।
समतल सुधार के लिए चैनल
- आधार रेखा, शून्य बिंदु और तरंग (B) के अंतिम बिंदु को जोड़ती है।
- समांतर रेखा, तरंग (A) के अंतिम बिंदु से खींची जाती है।
विकासशील चैनल की मदद से ट्रेडर बाजार की मजबूती या गिरावट का पहले से ही अनुमान लगा सकते हैं:
- जितनी बड़ी लहर (B) होगी, उतनी ही ज्यादा संभावना होगी कि लहर (C) के पूर्ण होने के बाद तेजी से उछाल आएगा।
- जब लहर (B) लहर (A) की तुलना में छोटी होती है, तो उतनी ही ज्यादा संभावना है कि समतल या तो विस्तृत अनुक्रम A)-(B)-(C) का पहला खंड होगा, फिर X-लहर के बाद अतिरिक्त सुधार देखने को मिल सकता है।
- जब चैनल पूरी तरह बन जाता है और लहर (C) की लंबाई लहर (A) के समान होती है, तो ज्यादातर स्थिति में सुधार के बाद X-लहर देखने को मिलता है, जिससे समतल संरचना जटिल सुधार का हिस्सा बन जाती है।
दोहरी और तिहरी समतल सुधार संरचनाओं में, हरेक संरचना की तरंग A और B के अंतिम बिंदुओं से चैनल बनाए जाते हैं।
समतल सुधार के लिए चैनल बनाने का उदाहरण।
ज़िगज़ैग पैटर्न के लिए चैनल
यह चैनल समतल सुधार चैनल की तरह बनता है। इसमें सिर्फ़ इतना अंतर है कि लहर (C) रुझान रेखा से दूरी बनाए रख सकती है या उसे पार कर सकती है, लेकिन स्पर्श नहीं कर सकती।
चार्ट में ऐसे चैनल निर्माण का उदाहरण दिखाया गया है, जिसमें लहर C रुझान रेखा को पार कर गई है।
अगर स्पर्श होता है, तो हम समझते हैं कि विश्लेषण किया गया ज़िगज़ैग पैटर्न, जटिल सुधारात्मक पैटर्न का भाग है, जैसे कि डबल या ट्रिपल थ्री या डबल या ट्रिपल ज़िगज़ैग। इसी समय, ज़िगज़ैग के बाद आने वाली लहर को प्रारंभिक पैटर्न के बिंदु से आगे नहीं जाना चाहिए। अगर यह 61.8% से कम वापसी करती है, तो इसे संभवतः X-लहर माना जा सकता है।
विश्लेषण की प्रक्रिया में, हम इस तथ्य को ध्यान में रखते हैं कि अगर लहर (C) चैनल की सीमा को पार कर जाती है, तो इसका अर्थ है कि उसका निर्माण समापन चरण में है।
ज़िगज़ैग पैटर्न अन्य पैटर्न की तुलना में चैनल बनाने के लिए ज्यादा उपयुक्त जोते हैं। सीमाएं अक्सर सभी उच्चतम सीमाओं से होकर गुज़रती हैं। सीमाओं का मामूली उल्लंघन संभव है।
दोहरे और तिहरे ज़िगज़ैग संयोजन समान रूप से विकसित होते हैं, मुख्य रूप से समांतर चैनल सीमाओं के भीतर बनते हैं। अंतिम सुधारात्मक चरण में ब्रेकआउट की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि इस खंड में अक्सर ट्रायंगल पैटर्न बनते हैं। आमतौर पर, इन पैटर्न की अंतिम तरंगें पूरी तरह से बनने से पहले, कम से कम एक बार चैनल सीमा के गलत ब्रेकआउट का संकेत मिलता है।
ट्रायंगल पैटर्न के लिए चैनल
ट्रायंगल के लिए, आधार रुझान रेखा तरंग (B) और (D) के अंतिम बिंदुओं से खींची जाती है और इसके ब्रेकआउट से पैटर्न के पूरा होने का संकेत मिलता है। दूसरी रेखा तरंगों के अंतिम बिंदुओं से खींची जाती है:
- (A) और (C) – सबसे सामान्य विधि;
- (A) और (E) – इस तरीके का कम इस्तेमाल किया जाता है;
- (A) और (E) – इस विधि का शायद ही कभी उपयोग होता है।
निचली चैनल सीमा बनाते समय, यह ज़रूरी है कि रेखा तीसरे उच्चतम स्तर को प्रतिच्छेदित न करें। इसके लिए अलग विधि मौजूद है।
सबसे पहले, हम यह देखते हैं कि तरंग (A) और (C) के अंतिम बिंदुओं से खींची गई रेखा तरंग (E) के अंतिम बिंदु को प्रतिच्छेदित करती है या नहीं।। अगर नहीं है, तो हम इसे वैसा ही रखते हैं और अगर यह इसे पार करती है, तो हम चैनल निर्माण की अगली विधि लागू करते हैं और देखते हैं कि रेखा तरंग (A) के उच्चतम स्तर को पार करती है या नहीं। अगर कोई प्रतिच्छेदन होता है, तो तरंग (A) और (E) के अंत बिंदुओं के माध्यम से एक चैनल बनाएं।
उपरोक्त चार्ट एक ट्रायंगल और एक चैनल दिखाता है। यह तरंग (B) और (D), (A) और (C) के अंत बिंदुओं से होकर गुजरता है। अंत बिंदु E चैनल की निचली सीमा को पार करती है। इसलिए, इसके बनाने का अन्य तरीका अपनाना बेहतर होगा।
यह ट्रायंगल पैटर्न की स्थिति में, सिर्फ़ तीसरी निर्माण विधि, तरंग (A) और (E) के अंतिम बिंदुओं से होकर गुजरती है, इस शर्त को पूरा करती है कि अंतिम बिंदु (E) चैनल की निचली सीमा को पार न करे।
डबल और ट्रिपल पैटर्न के लिए चैनल
कई तरह के मिले-जुले पैटर्न होने के कारण, चैनल बनाने के लिए कोई तय मानक नहीं है। ज़्यादातर स्थिति में, नीली का सुझाव है कि डबल और ट्रिपल फ्लैट की तरह, तरंग (B) के अंतिम बिंदु से होकर गुजरने वाली रुझान रेखा का आधार रेखा के रूप में इस्तेमाल किया जाए। साथ ही, तरंग (A) का अंतिम बिंदु एक रुझान रेखा बना सकता है। यह अक्सर चैनल की सीमा तक नहीं पहुंचती या उसे पार नहीं करती।
ट्रेडिंग में नियो वेव का इस्तेमाल कैसे करें?
इलियट के लचीले दृष्टिकोण के अलावा, नियो वेव थ्योरी से निश्चित प्रणाली के अनुसार ट्रेडिंग करने का सुझाव मिलता है, जिसमें वेवलेंथ रेशियो, तर्क के नियम, मूवमेंट लेवल की स्थिति और ग्राफिकल पैटर्न में तरंग अनुपात की स्वीकार्यता की जांच के माध्यम से कई संकेतों की पुष्टि की जाती है।
नियो वेव पद्धति के अनुसार. चरणबद्ध बाजार विश्लेषण इन योजना के तहत किया जाता है:
- मोनोवेव की पहचान और उनका वर्गीकरण, वेवलेंथ रेशियों के नियमों के अनुसार विश्लेषण, और संरचनात्मक सूची तैयार करना।
- वास्तविक संरचनात्मक चिह्नों का चयन और नियो वेव पैटर्न की पहचान।
- निर्माण, तर्क, समानता और विविधता के नियमों के अनुसार पैटर्न का विश्लेषण करना।
- मूवमेंट लेवल का प्रयोग।
- चैनल बनाना
- बाजार में प्रवेश और निकास बिंदुओं की पहचान करना।
नियो वेव थ्योरी का इस्तेमाल करके ट्रेडिंग का वास्तविक उदाहरण
आइए वास्तविक उदाहरण के माध्यम से नियो वेव थ्योरी को समझें।
उपरोक्त चार्ट आवेग बनाने वाले पालीवेव के संरचनात्मक लेबल को दिखाता है। मैं वेवलेंथ के सहसंबंध के नियमों के बारे में विस्तार से समझाऊंगा, जिसके आधार पर संरचनात्मक लेबल निर्धारित किए गए थे:
- पहली लहर (:5) – नियम 1, शर्त (b), m0, m1 का 61.8% से लेकर 100% तक।
- दूसरी तरंग (:F3) – यदि तरंग m0, m1 के 261.8% से ज्यादा है, तो नियम 7, शर्त (d) लागू होती है।
- तीसरी लहर (:5) –अगर m0, m1 के 61.8% से कम है, तो नियम 1, शर्त (a) लागू होती है। बिंदु 5 – m0 और m2 की अवधि एवं लंबाई अलग-अलग होती हैं, तरंगों के मूल्य अनुमान ओवरलैप नहीं होते हैं और m(-1), m1 और m3 में से सबसे छोटी लहर या तो m(-1) या m3 होती है।
- चौथी तरंग (:F3) – अगर m0, m1 के 261.8% से ज्यादा है, तो नियम 6, शर्त (d) लागू होती है। m2 की समय अवधि m1 के समान पैरामीटर से कम होती है और m1 की अवधि, m0 और m2 की तरंगों की समय सीमाओं से कम होती है।
- पांचवीं तरंग (:L5) – अगर m0, m1 के 100% से कम है, तो नियम 5, शर्त (a) लागू होती है। उप-शर्त 2 – m2 एक मोनोवेव है। बिंदु 1 – प्रारंभिक बिंदु का स्तर m1 के निर्माण के समय से कम या बराबर अवधि तक पहुंच जाता है और m(-2) और m0 के मूल्य अनुमान ओवरलैप नहीं होते हैं। साथ ही, m2 की लंबाई m(-2) से ज्यादा होती है और m(-2) और m0 की लंबाई और समय अवधि एक-दूसरे से काफी अलग होती हैं। और m(-1) का आयाम m1 और m(-3) से ज्यादा होता है।
नियो वेव पैटर्न पॉलीवेव विश्लेषण के परिणामस्वरूप विकसित होता है, जिनमें यह विस्तारित तीसरी लहर वाले ट्रेंड इंपल्स निर्माण के नियमों के अनुरूप है। यह पैटर्न पांच जुड़े हुए खंडों से बनता है, जिनमें से तीन एक ही दिशा में बनते हैं। दूसरा और चौथा खंड शेष तीन तरंगों के विपरीत दिशा में बनता है। तर्क के नियमों के अनुसार, विस्तारित तीसरे खंड वाले आवेग के बाद बनने वाली लहर को चौथी लहर के मूल्य क्षेत्र तक पहुंचना चाहिए। चार्ट पर, इसके बाद होने वाला पुलबैक चौथी लहर के स्तर तक पहुंचता है।
नियो वेव सिस्टम का इस्तेमाल करते समय, कोई भी व्यक्ति इन योजना के अनुसार पोजीशन खोल सकता है:
- उदाहरण के तौर पर, रुझान में उतार-चढाव का निर्धारण पैटर्न के अंतिम बिंदु से होता है।
- रुझान के विपरीत दिशा में चलने वाली कैंडलस्टिक के बंद होते ही ट्रेड शुरू किया जाता है।
मुनाफ़ा अगला पैटर्न बनने पर कमाया जाता है। ट्रेड को उस अनुमानित अंतिम बिंदु पर बंद किया जाता है, जहां कैंडलस्टिक पिछले पैटर्न की दिशा के विपरीत बनती है।
उपरोक्त चार्ट शॉर्ट पोजीशन खोलने और बंद करने का उदाहरण दिखाता है:
- पांच तरंग वाले आवेग पूरा होने के बाद शॉर्ट ट्रेड खोलें। बेचने का संकेत मंदी की कैंडलस्टिक के बंद होने से मिलता है। यह आवेग के विपरीत दिशा में बनती है। प्रवेश मूल्य को नीली रेखा से दिखाया गया है।
- स्टॉप-लॉस आर्डर को लाल रेखा से दिखाया गया, जिसे आवेग की पाँचवीं तरंग के समापन बिंदु से थोड़ा ऊपर लगाया जाता है।
- ज़िगज़ैग संरचना पर नज़र रखें। रिवर्सल पॉइंट का सही निर्धारण करने के लिए, पहले दो तरंगों के उच्चतम बिंदुओं के आधार पर चैनल की सीमाओं के भीतर इस पैटर्न को शामिल किया जाना चाहिए।
- निकासी बिंदु निर्धारित करें और ट्रेड बंद करें। ज़िगज़ैग की अंतिम तीन तरंगों को संरचनात्मक लेबल :L3 से दिखाया गया है, जिसकी तीन अलग-अलग वेव सरंचना होती हैं। इससे पैटर्न के अंतिम बिंदु की पहचान करने में सहायता मिलती है। जब कीमत चैनल की निचली सीमा को पार करती है, तो इससे एक अतिरिक्त संकेत मिलता है। जैसे ही :L3 खंड की दिशा के विपरीत हरी कैंडलस्टिक बंद होती है, हरी क्षैतिज रेखा वाले चिह्नित स्तर पर मुनाफा सुरक्षित करें।
निष्कर्ष
आधुनिक ट्रेडर बाजार से जुड़ी प्रक्रियाओं को समझने के लिए इलियट वेव थ्योरी को अतिरिक्त विश्लेषणात्मक विधि के रूप में अपनाते हैं। हालांकि, अलग-अलग विश्लेषण टूल के रूप में, यह अपनी व्याख्या की विषयपरकता के कारण प्रभावी नहीं है।
ग्लेन नीली ने नियो वेव थ्योरी में इस कमी का समाधान किया। यह बाजार की तरंग संरचना को निर्धारित करने के लिए सटीक दिशानिर्देश प्रस्तुत करता है। साथ ही, नियो वेव अपने मूल संस्करण की तरह ही अन्य बाजार विश्लेषण विधियों के साथ प्रभावी रूप से समायोजित हो जाता है।
नियो वेव थ्योरी में कुछ चुनौतियां हैं, जिनमें से सबसे जटिल चुनौती मोनोवेव और पॉलीवेव को सही ढंग से पहचान करने में तब होती है, जब खासतौर संरचनात्मक लेबल निर्धारित करने की बात आती है।
नियो वेव थ्योरी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ग्लेन नीलि ने नियो वेव थ्योरी विकसित की। तेल कंपनी में कार्यरत रहते हुए, उन्होंने इलियट वेव थ्योरी में खामियों की पहचान की। इलियट की पद्धति को सुधारने के उद्देश्य से विश्लेषक ने नया सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसमें कई नए नियम और वेक्टर भौतिकी के तत्व शामिल थे।
इलियट थ्योरी के अनुसार, सामूहिक ट्रेडर की मानसिकता, समूह मनोविज्ञान का रूप है। यह आशावाद और निराशावाद के बीच चक्रीय रूप से बदलती रहती है, जिसकी तीव्रता और अवधि समान रूप से दोहराई जाती है।
ग्लेन नीली ने नियो वेव के सफल उपयोग के लिए प्रमाणित पद्धति प्रस्तुत की। इसमें उन कमोडिटी मार्केट को चुनना शामिल है, जहां उपभोग का सीमित चक्र होता है और मांग स्थिर बनी रहती है। इस पद्धति से ऐसे बाजारों में कीमत में उतार-चढ़ाव का आंकलन करने में सफलता मिली है।
नियो वेव ट्रेडिंग में कमोडिटी मार्केट में पोजीशन खोलना और नियो वेव पैटर्न के विश्लेषण के ज़रिए निर्धारित पिवट पॉइंट पर मुनाफ़ा कमाना शामिल है।
नियो वेव, इलियट वेव थ्योरी का विकसित रूप है, जिसमें नीली ने वेक्टर फिजिक्स के पहलुओं को शामिल कर नए सिद्धांतों को अपनाया है, जिससे क्लासिकल वेव थ्योरी में सुधार हुआ। इस विधि को दोहराए जाने वाले मूल्य पैटर्न के संरचित विश्लेषण पर आधारित ज्यादा संतुलित मॉडल माना जाता है।
सुव्यवस्थित नियमावली के कारण, नियो वेव को ज्यादा संतुलित मॉडल माना जाता है, जिससे बाजार को अपनी व्यक्तिगत सोच या राय के आधार पर समझने की संभावना कम हो जाती है। हालांकि, क्लासिकल इलियट थ्योरी में ज्यादा फ्लेक्सिबल एनालिटिकल टूल होते हैं, जिससे यह नियो वेव लागू नहीं होने पर भी उपयुक्त विकल्प बन जाता है।
मोनोवेव मूलभूत वेव संरचना होती है, जिससे ज्यादा जटिल वेव पैटर्न बनते हैं। यह कीमत में उतार-चढ़ाव को दिखाता है। यह ट्रेंड में बदलाव होने पर शुरू होता है और उसी के साथ समाप्त होता है।
पॉलीवेव जटिल संरचना होती है, जिसमें तीन या पांच मोनोवेव शामिल होती हैं। ग्लेन नीली के अनुसार, तीन-तरंग वाली संरचनाओं को सुधारात्मक (करैक्शन) माना जाता है, जबकि पांच-तरंग वाली संरचनाओं को आवेग (इम्पल्स) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हालांकि, ट्रायंगल पैटर्न में भी पांच खंड होते हैं और यह नियम का अपवाद है। यही थ्योरी पारंपरिक इलियट वेव थ्योरी में भी लागू होता है।
अनुपात का नियम ऐसा साधन है, जिससे आपको मोनोवेव और पॉलीवेव की संरचना को उनकी लंबाइयों के अनुपात के आधार पर तय करने में मदद मिलती है। इन नियमों की मदद से विश्लेषित तरंगों की स्थिति को व्यापक तरंग संरचनाओं में समझा जा सकता है।

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