हर बार जब कोई ट्रेडर डेरिवेटिव मार्केट में प्रवेश करना चाहते हैं या क्रिप्टोकरेंसी पेयर्स में ट्रेड करते हैं, तो उनके सामने बिटकॉइन में शॉर्ट या लॉन्ग पोजीशन लेने का विकल्प होता है। क्रिप्टोकरेंसी में ज्यादा उतार-चढ़ाव को देखते हुए, केवल मजबूत बुल मार्केट का दिखना बिटकॉइन में लॉन्ग पोजीशन के लिए पर्याप्त कारण नहीं होता। फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट रखने वाले को जोखिम कम करने और यह तय करने के लिए कई कारकों को ध्यान में रखना पड़ता है कि उन्हें BTC में लॉन्ग पोजीशन या शॉर्ट पोजीशन खोलना चाहिए।

इस लेख में बताया जाएगा कि बिटकॉइन की शॉर्टिंग कैसे की जाती है और इस क्रिप्टो में लॉन्ग पोज़िशन लेकर मुनाफे वाली ट्रेडिंग कैसे की जा सकती है। आप जानेंगे कि बिटकॉइन में लॉन्ग और शॉर्ट ट्रेड क्या होते हैं और दोनों में क्या अंतर है। आप यह भी जानेंगे कि डिजिटल एसेट के शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म आउटलुक में किन जरूरी कारकों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि स्पॉट मार्केट में नुकसान से बचा जा सके।

इस आर्टिकल में निम्नलिखित विषय शामिल हैं:


बिटकॉइन शॉर्टिंग का क्या मतलब है?

मैं बिटकॉइन की शॉर्टिंग कैसे कर सकता हूं? सबसे पहले, मैं आपको समझाता हूं कि बिटकॉइन शॉर्टिंग का क्या मतलब होता है। क्रिप्टो ट्रेडिंग में शॉर्टिंग का मतलब आम तौर पर BTC जैसे किसी एसेट को इस मकसद से बेचना होता है कि बाद में उसे कम कीमत पर खरीदा जा सके। यानी, जो ट्रेडर बिटकॉइन की शॉर्टिंग करते हैं, वह यह मानकर चलते हैं कि स्पॉट मार्केट में एसेट की कीमत में गिरावट होगी और वह पहले से ही उसके हिसाब से पोजीशन ले लेते हैं। अगर कीमत में गिरावट आ जाती है, तो ट्रेडर बिटकॉइन को कम कीमत पर खरीदकर उन्हें फिर से ज़्यादा कीमत पर बेच सकते हैं। इस स्थिति में, बेचे गए एसेट से कीमत के अंतर की वजह से मुनाफ़ा होगा।

ट्रेडिंग में शॉर्टिंग जोखिम भरा तरीका है। क्रिप्टो ट्रेडिंग की अच्छी जानकारी के बिना इसे नहीं करना चाहिए। आइए अब मार्केट में शॉर्ट पोजीशन लेने के कुछ नियमों को समझते हैं:

  • डेरिवेटिव्स एक्सचेंज पर जरूरी एसेट की पहचान करें;
  • कीमत में गिरावट का सिग्नल मिलने का इंतज़ार करें और फिर कॉइन बेच दें;
  • जब बिटकॉइन की कीमत में गिरावट होने के बाद स्थिरता आने लगे और उसमें फिर से बढ़ने की संभावना दिखे, तो कॉइन वापस खरीद लें।

ऑप्शन जैसे डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में बिटकॉइन में लॉन्ग और शॉर्ट पोजीशन लेने का तरीका थोड़ा अलग होता है। डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट से यह संकेत मिलता है कि आप एक्सपायरी के बाद किस कीमत पर किसी क्रिप्टो डेरिवेटिव को खरीद या बेच सकते हैं। अगर एक्सपायरी की तारीख पर क्रिप्टो एसेट का डॉलर-आधारित मूल्य “पुट” स्ट्राइक प्राइस से नीचे चला जाता है, तो “पुट” की वैल्यू बढ़ जाती है और ट्रेडर को मुनाफा होता है।

नए ट्रेडर को BTC की शॉर्टिंग करने के तरीके को समझने के लिए शुरुआत में डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट से बचना चाहिए, क्योंकि उनका काम करने का तरीका थोड़ा जटिल होता है और इससे जल्दी पैसा नुकसान होने का जोखिम बढ़ सकता है।

आप बिटकॉइन की शॉर्टिंग कैसे करते हैं

अगर आपके मन में यह सवाल है कि "मैं बिटकॉइन की शॉर्टिंग कैसे करूं?", तो आइए मैं आपको इसके बारे में समझाता हूं। बिटकॉइन की शॉर्टिंग करना तभी समझदारी भरा कदम है, जब आपके पास यह मानने का कोई ठोस कारण हो कि इसकी कीमत गिरने वाली है। बेचने के संकेत पाने के लिए, आपको बाजार का विश्लेषण करना होगा और तकनीकी संकेतकों की रीडिंग, आर्थिक स्थिति और बिटकॉइन से जुड़ी उन इंडस्ट्री की खास जानकारी पर नज़र रखनी होगी, जिससे इसकी कीमत पर असर पड़ सकता है।

बिटकॉइन की शॉर्टिंग करते समय जोखिम को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप पहले से ट्रेडिंग लक्ष्य और उचित स्टॉप लॉस तय करें। अगर कीमत पूर्वानुमान के विपरीत दिशा में जाती है, तो इससे ट्रेड अपने-आप बंद हो जाएगा। नए क्रिप्टो ट्रेडर्स को स्टॉप लॉस को ट्रेड एंट्री पॉइंट के जितना संभव हो, उतना पास रखना चाहिए, ताकि संभावित नुकसान डिपॉज़िट के 1% से ज्यादा न हो।

BTC की शॉर्टिंग का उदाहरण

असली ट्रेडिंग उदाहरणों के ज़रिए बियरिश पोजीशन में प्रवेश करने के बारे में समझना ज़्यादा आसान होता है। आइए, BTC की शॉर्टिंग करने, लक्ष्य तय करने और मुनाफा कमाने के उदाहरण पर नज़र डालते हैं।

लाइटफाइनेंस: BTC की शॉर्टिंग का उदाहरण

आपको BTC में पैसा कमाने के लिए शॉर्ट या लॉन्ग पोजीशन लेने का फैसला करने के लिए स्पष्ट मार्केट सिग्नल्स की जरूरत होती है। यह सपोर्ट या रजिस्टेंस लेवल के ब्रेकआउट जैसा हो सकता है। इस स्थिति में, कीमत ट्रेंडलाइन को पार करती है (नीचे दिए गए चार्ट में नीला गोला)। इससे यह उम्मीद की जा सकती है कि आगे कीमत में गिरावट जारी रहेगी। इसलिए, कोई ट्रेडर अगली कैंडलस्टिक के खुलते ही (नीली लाइन पर) शॉर्ट पोजीशन ले सकते हैं ।

लाइटफाइनेंस: BTC की शॉर्टिंग का उदाहरण

बिटकॉइन तेजी से ऊपर-नीचे होने वाला एसेट है और इसका चार्ट रोलर-कोस्टर की तरह ऊपर-नीचे चलता रहता है।। अगर कीमत किसी अनचाही दिशा में चली जाती है, तो संभावित नुकसान को सीमित करने के लिए मैंने अगले स्थानीय उच्च स्तर (रेड सर्कल) पर स्टॉप लॉस लगाया है।

लाइटफाइनेंस: BTC की शॉर्टिंग का उदाहरण

लक्ष्य तय करने के लिए हम पिछले चार्ट में अगले निम्नतम स्तर (ग्रीन सर्कल), यानी सपोर्ट ज़ोन को तय करते हैं। जब कीमत सपोर्ट लेवल तक पहुंचती है, तो ट्रेड को मुनाफ़े के साथ बंद कर दिया जाता है (ग्रीन लाइन)।

बिटकॉइन लॉन्गिंग का क्या मतलब होता है?

एक्सचेंज वॉलेट की मौजूदगी में लॉन्गिंग या लॉन्ग पोजीशन खोलना असल में कम कीमत पर बिटकॉइन की खरीदारी करना होता है, ताकि जब BTC की कीमत में बढ़ोतरी हो, तो उसे बेचकर मुनाफ़ा कमाया जा सके। इस तरह की ट्रेडिंग किसी भी सेंट्रलाइज्ड और डिसेंट्रलाइज्ड एक्सचेंज पर उपलब्ध है, जिसमें किसी भी क्रिप्टो वॉलेट का उपयोग करना शामिल है। इसका अपवाद हार्डवेयर वॉलेट होता है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर कॉइन को सुरक्षित रूप से स्टोर करने के लिए किया जाता है और इसलिए यह ट्रेडिंग से जुड़े लेन-देन के लिए सुविधाजनक नहीं होता।

क्रिप्टो डेरिवेटिव ट्रेडिंग में लॉन्गिंग का मतलब आम तौर पर किसी कॉन्ट्रैक्ट को खरीदना होता है, ताकि क्रिप्टो एसेट को 1 दिन में डिलीवर किया जा सके। लेकिन एक्सपायरी से पहले यह कॉन्ट्रैक्ट अगले दिन अपने-आप फिर से ओपन हो जाता है। इस वजह से यह असल में कभी खत्म नहीं होता और लगातार चलता रहता है। ट्रेडिंग में इस वित्तीय साधन को परपेचुअल स्वैप या परपेचुअल फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट कहा जाता है।

आइए बिटकॉइन में लॉन्गिंग करने के चरण को समझते हैं।

  • बाजार का विश्लेषण करें और कीमतों में जल्द ही होने वाली बढ़ोतरी के संकेत की अपेक्षा करें;
  • जब कीमत में बढ़ोतरी होने लगे, तो लॉन्ग ट्रेड में प्रवेश करें;
  • जब मूल एसेट की कीमत में बढ़ोतरी हो जाए, तो उसे बेच दें।
  • ट्रेड का मुनाफा एंट्री प्राइस और एग्ज़िट प्राइस के बीच के अंतर के बराबर होता है।

बिटकॉइन में लॉन्ग पोजीशन लेने का तरीका

ब्रोकर के ज़रिए ट्रेडिंग करने में लगभग हमेशा लीवरेज का इस्तेमाल होता है, जिससे संभावित मुनाफ़ा और संभावित नुकसान, दोनों ही बढ़ जाते हैं। दूसरी ओर, बिटकॉइन ज्यादा उतार-चढ़ाव के लिए जाना जाता है और इसकी कीमत अक्सर बहुत कम समय में ही अपनी दिशा बदल लेती है। इसलिए, लॉन्ग पोज़िशन को भी उतनी ही सावधानी और सतर्कता के साथ लेना चाहिए, जितनी शॉर्ट पोज़िशन को लिया जाता है।

लॉन्ग पोज़िशन तभी खोलें, जब कीमत में बढ़ोतरी और लंबी अवधि में ऊपर जाने का भरोसेमंद संकेत मिले। बेहतर होगा कि ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति में मुख्य संकेतों के साथ-साथ अतिरिक्त पुष्टि करने वाले संकेतों का भी इस्तेमाल किया जाए। इससे आप कुल लॉन्ग ट्रेड की संख्या कम कर सकते हैं और साथ ही अपने अनुमान की सटीकता बढ़ा सकते हैं।

BTC में लॉन्ग पोजीशन का उदाहरण

आइए वास्तविक उदहारण के जरिए BTC में लॉन्ग एंट्री को समझते हैं।

लाइटफाइनेंस: BTC में लॉन्ग पोजीशन का उदाहरण

बुल मार्केट में लॉन्ग पोजीशन लेने का संकेत तब मिलता है, जब कीमत पिछले स्थानीय उच्च स्तर (पर्पल लाइन) को पार कर जाती है।

लाइटफाइनेंस: BTC में लॉन्ग पोजीशन का उदाहरण

ब्रेकआउट के बाद अगली कैंडलस्टिक के ओपन होने पर (ब्लू लाइन) ट्रेड में प्रवेश करें। एंट्री पॉइंट से थोड़ा नीचे, यानी एंट्री से पहले बने निम्नतम स्तर के आसपास स्टॉप लॉस (रेड लाइन) लगाया जाता है।

टेक प्रॉफिट अगले स्थानीय उच्च स्तर (ग्रीन लाइन) पर सेट किया जाता है। जब कीमत इस स्तर तक पहुंच जाए, तो ट्रेड से बाहर निकल जाना चाहिए। अगर कीमत इस उच्चतम स्तर को पार कर जाए, जैसा कि इस स्थिति में हुआ है, तो उसी रणनीति के अनुसार नया लॉन्ग ट्रेड शुरू करें।

कम से कम जोखिम के साथ बिटकॉइन में लॉन्ग पोजीशन लेने का तरीका

ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित डिजिटल करेंसी बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली होती हैं। इससे पैसे कमाने के ज्यादा मौके मिलते हैं, लेकिन साथ ही जोखिम भी बढ़ जाता है। यहां तक कि जो ट्रेडर एडवांस टेक्निकल एनालिसिस का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें भी यह देखने को मिलता है कि कभी-कभी किसी न्यूज या सिस्टम के अंदर होने वाली घटना की वजह से चार्ट अचानक विपरीत दिशा में बदलता हुआ दिखाई देता है। इसलिए ट्रेडिंग करते समय जोखिम को कम करना बहुत जरूरी होता है।

1. पोजीशन ट्रेडिंग

यह तरीका नए ट्रेडर्स के लिए आसान और सही माना जाता है। इसमें आप क्रिप्टो को खरीदकर लंबे समय तक रखते हैं ताकि दिन-भर के छोटे उतार-चढ़ाव और मार्केट में अनियमित उतार-चढ़ाव का असर आपकी ट्रेड पर न पड़े। इसमें सबसे जरूरी नियम यह है कि आप अपने रिस्क और रिवार्ड रेशियो का अनुपात सही रखें। यह आमतौर पर 1:3 से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

2. पोजीशन बढ़ाना

पोजीशन बढाने का मतलब है कि जब चार्ट में ऊपर की ओर रूझान के संकेत मिलते हैं, तो ट्रेडर धीरे-धीरे BTC खरीदते हैं और जैसे-जैसे कीमत बढती हैं, अपने लॉन्ग पोजीशन को बढाते हैं। उदाहरण के तौर पर, आप अपनी पोज़िशन का वॉल्यूम तब बढ़ा सकते हैं, जब चार्ट ब्रेकइवन ज़ोन में आ जाए, तो आप अपनी पोजीशन का वॉल्यूम बढ़ा सकते हैं और मुख्य स्तर या स्थानीय उच्चतम स्तर पार करने पर आप उसमें और जोड़ सकते हैं। इस तरह, अगर विकास के संकेतों की गलत व्याख्या हो जाती है, तो ट्रेडर अपने संभावित नुकसान को कम कर सकते हैं।

3. औसत निकालना

जब कीमत में गिरावट आती है, तो आप अपनी जमा राशि के छोटे-छोटे शेयर में BTC खरीदते हैं। यह तरीका अल्पकालिक गिरावट के दौरान तब इस्तेमाल किया जा सकता है, जब आपको भरोसा हो कि लंबी अवधि में बिटकॉइन की कीमत में बढ़ोतरी होगी।

4. हेजिंग

आप ऐसे शॉर्ट ट्रेड करते हैं, जिससे बिटकॉइन के लॉन्ग ट्रेड में होने वाले नुकसान से बचाव होता है। उदाहरण के तौर पर, आप स्पॉट मार्केट में BTCUSD खरीदते हैं और साथ ही फ्यूचर्स मार्केट में शॉर्ट पोजीशन भी लेते हैं। यह शॉर्ट ट्रेड, लॉन्ग ट्रेड के लिए कीमतों में होने वाली गिरावट से सुरक्षा प्रदान करा है। वहीं दूसरी ओर, शॉर्ट पोजीशन पर होने वाला नुकसान असल में इंश्योरेंस प्रीमियम की तरह होता है और अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो यह लॉन्ग ट्रेड से होने वाले मुनाफ़े को कम कर देता है।

BTC शॉर्ट और लॉन्ग की हेजिंग के लिए एक और तरीका भी होता है। इसमें बिटकॉइन की शॉर्टिंग करने के बजाय आप किसी ऐसे एसेट को खरीद सकते हैं, जो BTCUSD से नकारात्मक रूप से संबंधित हो। हालांकि क्रिप्टो मार्केट में यह करना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि ब्लॉकचेन एसेट-क्लास पर आधारित लगभग सभी करेंसी बिटकॉइन की ही दिशा में आगे बढ़ती है।

बिटकॉइन में लॉन्ग और शॉर्ट पोजीशन

आइए बिटकॉइन के लॉन्ग और शॉर्ट पोजीशन की तुलना करें। ट्रेडिंग हमेशा जोखिम से जुड़ी होती है, हे आप लॉन्ग या शॉर्ट पोजीशन लें। हालांकि, इन दोनों में जोखिम अलग-अलग होते हैं।

लॉन्ग ट्रेड में मुनाफा सीमित नहीं होता, क्योंकि कीमत कितनी भी ऊपर जा सकती है। हालांकि, वास्तविक ट्रेडिंग में कीमत का बढ़ना इस बात पर निर्भर करता है कि खरीदार कितनी उच्चतम कीमत पर उस कॉइन को खरीदने के लिए तैयार होते हैं। बड़े-बड़े ट्रेडर्स की भी अपनी सीमाएं होती हैं, फिर भी मुनाफे पर कोई सख्त सीमा नहीं होती।

जहां तक बिटकॉइन शॉर्ट की बात है, तो कीमत में संभावित गिरावट की सीमा शून्य तक ही होती है, उससे नीचे नहीं जाती। इसलिए इसे “शॉर्ट” कहा जाता है, यानी इसकी एक सीमा होती है और इसे ज्यादा समय तक नहीं रखा जाता। ऐसा पोजीशन तभी लेना चाहिए, जब मार्केट में साफ़ तौर पर गिरावट दिख रही हो। शॉर्ट पोजीशन लगभग हमेशा लीवरेज से जुड़ी होती है, इसलिए नए लोगों के लिए इसमें ज्यादा जोखिम होता है। इसलिए नए ट्रेडर्स को पहले डेमो अकाउंट या छोटे निवेश के साथ प्रैक्टिस करने का सुझाव दिया जाता है।

प्रोफेशनल ट्रेडर्स के लिए बिटकॉइन में शॉर्ट और लॉन्ग पोजीशन की विशेषताएं उतनी मायने नहीं रखती। आखिरकार, यह इतना जरूरी नहीं है कि आपने कौन-सी पोजीशन ली है, बल्कि यह ज़्यादा जरूरी है कि ये आम मार्केट ट्रेंड को फॉलो करते हैं या नहीं। इसलिए, ट्रेड में प्रवेश करने से पहले पूरे मार्केट ट्रेंड को समझना बेहद जरूरी है। ट्रेडिंग का सबसे ज़रूरी नियम यह है कि आपको हमेशा मार्केट के ट्रेंड के अनुसार चलना चाहिए।

BTC लॉन्ग/शॉर्ट अनुपात

बिटकॉइन लॉन्ग/शॉर्ट रेशियो मार्केट में मौजूद मार्जिन पर लिए गए BTC की संख्या को दिखाता है। बिटकॉइन लॉन्ग/शॉर्ट रेशियो का इस्तेमाल BTCUSD पेयर की अल्पकालिक मूवमेंट का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है। इस टूल के साथ काम करते समय इसकी खास बातों को समझना बहुत जरूरी होता है।

  • यह रेशियो दिखाता है कि मार्जिन पर कितना एसेट खुला हुआ है, न कि कितनी पोजीशन ली गई है।
  • यह इंडीकेटर सिर्फ मार्जिन वाली पोजीशन को ही ध्यान में रखता है;
  • यह टूल सिर्फ शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग के लिए ही सही रहता है।

लाइटफाइनेंस: BTC लॉन्ग/शॉर्ट अनुपात

यह माना जाता है कि यह इंडीकेटर मार्केट के रूझान को दिखाता है। आम तौर पर, शॉर्ट पोजीशन की तुलना में लॉन्ग पोजीशन का अनुपात ज्यादा होने का मतलब है कि बाजार में ज्यादा खरीदारी हो रही है और अब इसमें गिरावट हो सकती है।

ट्रेडिंग में बिटकॉइन लॉन्ग/शॉर्ट रेशियो टूल का इस्तेमाल करते समय आपको सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इसकी कुछ सीमाएं होती हैं:

  • डेरिवेटिव में सिर्फ़ पोजीशन को ध्यान में रखा जाता है, इसलिए उनकी संख्या में हेरफेर करना आसान है।
  • यह इंडीकेटर कई स्पॉट मार्केट प्रतिभागियों, ऑप्शंस मार्केट और अन्य ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के रुझान को नहीं दिखाता है।
  • मार्जिन मार्केट में लंबी अवधि का निवेश शामिल नहीं होता, इसलिए इस इंडीकेटर का इस्तेमाल मध्यम-अवधि और लंबी-अवधि के रुझानों को समझने के लिए नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

लॉन्ग और शॉर्ट पोजीशन के बीच चुनाव आमतौर पर बाजार के रुझान के अनुमान पर आधारित होता है। ट्रेड में प्रवेश करने के बाद कीमत जिस दिशा में जाती है, उसी से तय होता है कि नुकसान या फायदा होगा। इसलिए, शॉर्ट या लॉन्ग पोजीशन चुनते समय मार्केट विश्लेषण और ट्रेंड के पूर्वानुमान पर खास ध्यान देना जरूरी है।

मार्जिन पर ट्रेड करते समय आपको मनी मैनेजमेंट से जुड़े नियमों का सख्ती से फॉलो करना चाहिए। बिटकॉइन ज्यादा जोखिम वाले एसेट होते हैं और लीवरेज के साथ ट्रेडिंग करने पर इसमें जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

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बिटकॉइन में लॉन्ग और शॉर्ट ट्रेडिंग से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हां, क्रिप्टोकरेंसी की ट्रेडिंग उसी सिद्धांत पर होती है, जिस पर पारंपरिक फिएट करेंसी की होती है। क्रिप्टोकरेंसी पेयर्स में ट्रेड करते समय, आप फॉरेक्स ब्रोकर की मदद से लॉन्ग और शॉर्ट दोनों तरह के ट्रेड खोल सकते हैं।

हां, LiteFinance टर्मिनल से आपको शॉर्ट पोजीशन खोलने का मौका मिलता है। लेकिन शॉर्ट करने से पहले, हम यह सुझाव देते हैं कि यह सुनिश्चित कर लें कि कीमत में गिरावट आने वाली है।

BTC लॉन्ग/शॉर्ट अनुपात, एनालिटिकल स्टॉक इंस्ट्रूमेंट का इन-बिल्ट इंडीकेटर है। यह ओपन मार्जिन वाले बिटकॉइन का रेशियो दिखाता है। जब BTC लॉन्ग/शॉर्ट पोजीशन का रेशियो कम समय में उच्चतम लेवल पर पहुंच जाता है, तो इससे संकेत मिलता है कि कीमतों में जल्द गिरावट आ सकती है।

लॉन्ग या लॉन्ग पोजीशन का मतलब बिटकॉइन को कम कीमत पर खरीदना है, ताकि उसे बाद में ज्यादा कीमत पर बेचकर कीमत के अंतर से मुनाफा कमाया जा सके। लॉन्ग पोजीशन आमतौर पर तब ली जाती है, जब मार्केट बढ़ रहा हो या जब यह मजबूत संकेत मिले कि कीमत में बढ़ोतरी होगी।

शॉर्ट या शॉर्ट पोजीशन का मतलब किसी एसेट को उच्चतम कीमत पर इस मकसद से बेचना है कि बाद में उसे कम कीमत पर खरीदा जा सके। शॉर्ट पोजीशन तब खोला जाता है, जब ट्रेडर को यह भरोसा होता है कि कीमत में जल्द ही गिरावट होने वाली है।

बिटकॉइन (BTC) में शॉर्ट और लॉन्ग पोजीशन

इस लेख की सामग्री, लेखक की राय को दिखाती है और यह लाइटफाइनेंस के ब्रोकर की आधिकारिक स्थिति को जरूरी नहीं दिखाती। इस पेज पर पब्लिश सामग्री सिर्फ़ सूचना के उद्देश्यों के लिए प्रदान की गई है और इसे निर्देश 2014/65/EU के उद्देश्यों के लिए निवेश की सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।
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