तकनीकी विश्लेषण (TA) शेयर बाज़ार और अन्य एसेट (जैसे करेंसी पेयर, CFD आदि में ट्रेडिंग) का अध्ययन करने का लोकप्रिय तरीका है, ताकि उनकी मौजूदा स्थिति और भावी संभावनाओं को समझा जा सके। शेयर बाज़ार के तकनीकी विश्लेषण का टूलकिट बहुत व्यापक है और यह बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध होता है और इसमें न तो किसी अतिरिक्त सॉफ़्टवेयर इंस्टॉल करने की ज़रूरत होती है और न ही LiteFinance तथा Plus500 जैसे बड़े ब्रोकर पर रजिस्ट्रेशन कराने की ज़रूरत होती है। शेयरों के तकनीकी विश्लेषण की कम-से-कम बुनियादी समझ रखना बहुत ज़रूरी है, ताकि शुरुआती और छोटी-छोटी ग़लतियों से बचा जा सके।
इस आर्टिकल में निम्नलिखित विषय शामिल हैं:
- तकनीकी विश्लेषण क्या है?
- तकनीकी विश्लेषण का 3 मुख्य सिद्धांत
- मौलिक विश्लेषण और तकनीकी विश्लेषण में क्या अंतर है?
- तकनीकी विश्लेषण: टॉप-डाउन बनाम बॉटम-अप
- तकनीकी विश्लेषण के प्रकार
- तकनीकी विश्लेषण के वित्तीय साधन
- चार्ट
- इंडीकेटर
- सामान्य शब्द
- तकनीकी विश्लेषण के फ़ायदे
- तकनीकी विश्लेषण के नुकसान
- निष्कर्ष
- तकनीकी विश्लेषण से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इस लेख से आपको तकनीकी विश्लेषण में महारत हासिल करने की दिशा में पहला कदद उठाने में मदद मिलेगी और इसमें उन मूल अवधारणाओं के बारे में बताया जाएगा, जिन पर तकनीकी विश्लेषण आधारित है और यह फंडामेंटल एनालिसिस से किस प्रकार अलग है। आप इसमें तकनीकी चार्ट की विश्लेषण विधियों, मुख्य टूल्स, इंडिकेटर्स और चार्ट के प्रकार के बारे में भी जानेंगे।
तकनीकी विश्लेषण क्या है?
सरल शब्दों में कहें, तो यह सबसे अच्छे तरीक़ों में से एक है, जिससे किसी भी एसेट की कीमत का अनुमान लगा सकते हैं। इसकी वजह यह है कि लगभग सभी वित्तीय बाज़ार एक जैसे मनोवैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलते हैं। इसलिए, टेक्निकल स्टॉक एनालिसिस में उन तरीक़ों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वित्तीय बाज़ारों के भीतरी जीवन और उनकी भावनात्मक स्थिति का अध्ययन किया जा सके, यानी प्रतिभागियों के आशावाद और निराशावाद के स्तर को समझा जा सके।
फंडामेंटल एनालिसिस के विपरीत, तकनीकी विश्लेषण में किसी शेयर की कीमत को प्रभावित करने वाले बाहरी मूलभूत कारकों को ध्यान में नहीं रखा जाता है, जैसे प्रतिस्पर्धा या कंपनी के उत्पादों की मांग। अपने पूर्वानुमान में, टेक्निकल एनालिस्ट चार्ट पर पैटर्न खोजने और गणितीय गणनाएं करने के लिए अलग-अलग टूल्स का उपयोग करते हैं। यह माना जाता है कि किसी एसेट की कीमत में पहले से ही उन सभी कारकों को शामिल कर लिया गया है, जिससे जारी करने वाली कंपनी की स्थिति पर असर पड़ता है। यह कथन किसी भी ट्रेडिंग से जुड़े अन्य वित्तीय साधन के लिए भी सही है।
आश्चर्यजनक रूप से, टेक्निकल एनालिसिस की शुरुआत कई सौ साल पहले हुई थी। इसकी पहली रूपरेखा 17वीं शताब्दी में जोसेफ डे ला वेगा ने तैयार की थी, जिसे डच व्यापारियों ने बड़े पैमाने पर अपनाया। आज जिस कैंडलस्टिक प्राइस चार्ट को हम इतना ज़्यादा देखते हैं, उसकी खोज भी कोई नई नहीं है। इसे करीब 200 साल पहले जापान के राइस ट्रेडर होम्मा मुनेहिसा ने बनाया था।
शेयर बाज़ार में लोगों की भावनाएं कैसे बदलती हैं और उनका असर कीमतों पर कैसे पड़ता है, इसे समझाने वाले पहले क्लासिकल आइडिया 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में सामने आए। मशहूर टेक्निकल एनालिस्ट चार्ल्स डॉ और पीटर हैमिल्टन की किताबें "टेक्निकल एनालिसिस ऑफ़ मार्केट" और "स्टॉक मार्केट थ्योरी" वास्तव में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबे बन गई। डॉ थ्योरी ने आगे चलकर शेयर बाज़ार के टेक्निकल एनालिसिस की मजबूत नींव रखी।
20वीं सदी की शुरुआत में, विलियम गन, रिचर्ड वायकॉफ और राल्फ इलियट ने अपनी रचनाएं प्रकाशित की। उनके तरीकों का इस्तेमाल हज़ारों विश्लेषक, ट्रेडर और निवेशक करते हैं। 1948 में, रॉबर्ट एडवर्ड्स और जॉन मैगी की एक किताब, "टेक्निकल एनालिसिस ऑफ़ स्टॉक ट्रेंड्स" प्रकाशित हुई, जिसका आज भी पुनर्मुद्रण हो रहा है और हर ट्रेडर इसमें दी गई तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।
हर ट्रेडर शेयरों के तकनीकी विश्लेषण से सहमत नहीं होते हैं, इसके विरोधी भी होते हैं। ज़्यादातर ऐसे लोग ट्रेडिंग को कसीनो का खेल समझते हैं। आमतौर पर वे इफिशिएंट मार्केट हाइपोथेसिस और रैंडम वॉक हाइपोथेसिस की बात करते हैं। मैं इन सिद्धांतों की गहराई में नहीं जाऊंगा, लेकिन इतना कह सकता हूं कि ये सही काम नहीं करते और इनकी खूब आलोचना होती है। इसी कड़ी में माइकल पुलोस का ज़िक्र ज़रूरी है, जिन्होंने रैंडम वॉक इंडेक्स नाम का टेक्निकल एनालिसिस इंडीकेटर बनाया।
तकनीकी विश्लेषण का 3 मुख्य सिद्धांत
शेयरों के तकनीकी विश्लेषण के तीन अहम सिद्धांत हैं, जिससे आपके वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिल सकती है।
- बाज़ार पर हर चीज़ का असर पड़ता है: खबरें, आंकड़े, आर्थिक तकनीकी संकेतक, भावनाएं और निवेशकों की उम्मीदें।
- मार्केट आमतौर पर जिस दिशा में चलता है, कुछ समय तक उसी दिशा में चलता रहता है। अगर बाजार में तेजी का रुझान है, तो इस बात की ज्यादा संभावना होती है कि कीमतों में तेजी का रुझान जारी रहेगा। अगर मंदी का रुझान है, तो गिरावट जारी रहेगी। कभी-कभी बाजार में कोई स्पष्ट रुझान नहीं दिखता है। बाजार के स्थिर बने रहने की संभावना तब तक बनी रहती है, जब तक कि तेजी या गिरावट के लिए पर्याप्त मजबूत कारक न बन जाए।
- बाज़ार ऊपर-नीचे होता रहता है और आने वाले दाम भी लहरों की तरह चलते हैं। टेक्निकल ट्रेडिंग का मतलब है कि लोग ये मानकर चलते हैं कि बाज़ार में जैसा पहले था, वही दोबारा भी होने की संभावना रहती है। ऐसे में, कई निवेशक वही क़दम उठाते हैं जो उनसे पहले वाले निवेशक दिन, हफ़्ते, महीने या सालों पहले उठा चुके होते हैं। इसी को प्राइस ट्रेंड ट्रेडिंग कहते हैं।
मौलिक विश्लेषण और तकनीकी विश्लेषण में क्या अंतर है?
बाज़ार विश्लेषण के दो प्रमुख दृष्टिकोण होते हैं: तकनीकी और मौलिक विश्लेषण। इनमें क्या अंतर है?
तकनीकी विश्लेषण में, सिर्फ़ चार्ट और कीमत में उतार-चढ़ाव को ही ध्यान में रखा जाता है। विश्लेषक मूल्य स्तर और दिशा, पिछली कीमत, नए निम्नतम और उच्चतम स्तर, कैंडल, रुझान की चक्रीयता, उसके कोण, गति आदि पर ध्यान देते हैं।
फंडामेंटल एनालिस्ट आर्थिक आंकड़ों के आधार पर ट्रेडिंग करते हैं। शेयरों के मामले में उनकी गणना में हानि और लाभ के आँकड़े, कार्यशील पूंजी की शेष राशि, लेनदारों के प्रति ऋण आदि को ध्यान में रखा जाता है। वहीं कमोडिटी के लेन-देन में ये विश्लेषक आपूर्ति और माँग के स्तर, कच्चे माल के उत्पादन में अनुमानित बढ़ोतरी और गिरावट, लॉजिस्टिक्स की विशेषताएं और मांग को बढ़ाने या घटाने वाले कारकों पर ध्यान देते हैं।
टाइम-फ्रेम में भी अहम अंतर होता है। मौलिक विश्लेषण का इस्तेमाल आमतौर पर लंबे टाइम-फ्रेम पर ट्रेडिंग करते समय किया जाता है, क्योंकि दाम पर असर डालने वाले कारक इतने छोटे समय में बदल नहीं पाते। बाजार तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल मासिक मूल्य चार्ट और अल्पकालिक 15-मिनट के चार्ट और यहां तक कि 5-मिनट के कैंडलस्टिक चार्ट, दोनों पर किया जा सकता है।
तकनीकी विश्लेषण: टॉप-डाउन बनाम बॉटम-अप
टेक्निकल ट्रेडर्स आशाजनक एसेट चुनने के लिए टॉप-डाउन और बॉटम-अप तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। पहला सामान्य और विशिष्ट सिद्धांत पर आधारित होता है, जबकि दूसरा विशिष्ट और सामान्य व्यापारिक दृष्टिकोण पर आधारित होता है।
टॉप-डाउन तकनीकी विश्लेषण
इस तकनीकी विश्लेषण की विधि में जटिल कारकों का मूल्यांकन शामिल होता है। इससे सुझाव मिलता है कि निवेशक सबसे पहले पूरे बाज़ार की स्थिति के बार में जानें और फिर बाज़ार की संरचना पर ध्यान दें।
उदाहरण के तौर पर, इस तरह के विश्लेषण में तीन चरण हो सकते हैं:
- S&P 500, डॉव इंडस्ट्रियल्स, NASDAQ और NYSE जैसे प्रमुख इंडेक्स की स्थिति का मूल्यांकन करके सामान्य बाज़ार विश्लेषण।
- उद्योग या किसी अन्य विभेदक कारक के आधार पर मजबूत और कमजोर एसेट की पहचान करने के लिए क्षेत्रीय विश्लेषण।
- सबसे संभावनाशील एसेट की पहचान करने के लिए अलग-अलग एसेट का विश्लेषण।
बॉटम-अप तकनीकी विश्लेषण
यह विधि पिछली विधि की तुलना में आसान है, लेकिन इसके कई नुकसान भी हैं। बॉटम-अप ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति में निवेशक अलग-अलग कंपनियों या क्षेत्रों के प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यानी निवेशक बाज़ार की पूरी स्थिति की बजाय अलग-अलग एसेट की विशेषताओं के आधार पर मुनाफे वाले अवसरों की पहचान करते हैं। इस रणनीति के अनुसार, ट्रेडर बाजार के सामान्य रुझानों पर कम ध्यान देते हैं। भविष्य में वैश्विक बदलावों की स्थिति में, ट्रेड में नुकसान होने का जोखिम बढ़ जाता है।
तकनीकी विश्लेषण के प्रकार
तकनीकी विश्लेषण समझने के लिए कई तरीके हैं जिनसे कीमत में उतार-चढ़ाव का अध्ययन किया जाता है।। इनमें से कुछ तरीके व्यक्तिगत कैंडल्स के आकार, लंबाई और अन्य विशेषताओं और बार्स के समूह विश्लेषण पर केंद्रित होते हैं। अन्य तरीकों में ऑसिलेटर्स, मूविंग एवरेजेज़ या इलियट वेव जैसे अतिरिक्त टूल का इस्तेमाल किया जाता है। ट्रेडर अक्सर कई तरीकों का एक साथ इसेमाल करते हैं। इससे तकनीकी ट्रेडर्स को यह समझने में मदद मिलती है कि कौन से कारण कीमत को ऊपर या नीचे ले जाते हैं, भविष्य का अंदाज़ा लगाने में आसानी होती है, और आगे के समय के लिए अनुमान लगाने में मदद मिलती है।
ग्राफ़िकल विश्लेषण
ज्यादातर ट्रेडर इसी तरह का विश्लेषण शुरू करते हैं। ग्राफ़िकल विश्लेषण में ऐसे पैटर्न देखे जाते हैं, जिससे पता चलता है कि ट्रेंड जारी रहेगा या इसमें उलटफेर होगा। इसमें "ट्रायंगल", "हेड एंड सोल्डर", "फ़्लैग" और अन्य कुछ लोकप्रिय पैटर्न शामिल हैं। ग्राफ़िकल विश्लेषण पैटर्न के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए, आप "सबसे प्रभावी फ़ॉरेक्स पैटर्न: संपूर्ण गाइड" लेख देख सकते हैं। जब आप मौजूदा और भावी कीमत की दिशा तय करना, चार्ट पैटर्न की पहचान करना सीख जाएंगे, तो आप छोटे और लंबे समय के लिए भविष्यवाणी कर पाएंगे।
उदाहरण के तौर पर, EURUSD चार्ट में "फ़्लैग" पैटर्न दिख रहा है, जिससे रुझान के जारी रहने का संकेत मिलता है। बाज़ार थोड़े समय के लिए एक ही रेंज में स्थिर रहता है, लेकिन यह सिर्फ अस्थायी होता है; असली ट्रेंड बाद में फिर से शुरू हो जाता है। सुधार खत्म होने के बाद, चार्ट में दिखाए गए पैटर्न के अनुसार रुझान फिर से जारी रहा।
इंडीकेटर का विश्लेषण
यह अलग-अलग गणना विधियों और फार्मूला के उपयोग पर आधारित होता है। इनमें नीचे दिए गए पैरामीटर शामिल हो सकते हैं:
- प्राइस लेवल: शुरूआती स्तर, समाप्ति स्तर, उच्च और निम्न स्तर
- ट्रेडिंग वॉल्यूम।
सबसे लोकप्रिय तकनीकी इंडीकेटर मूविंग एवरेज इंडीकेटर, MACD, RSI और बोलिंगर बैंड हैं। कुल मिलाकर लगभग पचास विश्लेषण टूल को खास तकनीकी विश्लेषण टूल (TA) में शामिल किया जा सकता है। इन्हें चार मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है:
- बिल विलियम्स इंडीकेटर;
- वॉल्यूम;
- ऑसिलेटर;
- ट्रेंड।
ओपन-सोर्स कोड की मदद से, तकनीकी विश्लेषण के प्रति उत्साही लोग अलग-अलग इंडीकेटर के फ़ंक्शन को जोड़ते हैं और कोड में बदलाव करके अपना खुद का इंडिकेटर बना लेते हैं, जो ज़्यादा सटीक और प्रभावी होता है। परफ़ेक्ट इंडिकेटर की खोज में, ट्रेडर्स ने हजारों नए खुद के लिखे हुए इंडीकेटर बनाए हैं, जिनमें से कई mql5.com पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
इंडीकेटर विश्लेषण में कई टूल का एक साथ इस्तेमाल किया जाता है, ताकि गलत संकेत हटाए जा सकें और सही पूर्वानुमान लगाया जा सके।
उपरोक्त चार्ट दिखाता है कि कीमत के चार्ट और MACD हिस्टोग्राम (बैंगनी रेखा) की दिशा अलग हो रही है। इससे तेजी के रुझान में उलटफेर का संकेत मिलता है। बोलिंजर बैंड के संकीर्ण होने से भी रुझान में उलटफेर की पुष्टि होती है। मंदी का पैटर्न एक ही समय में दो कैंडलस्टिक चार्ट पर दिखाई दे रहा है।
- कीमत बोलिंजर बैंड की निचली सीमा से बाहर चली जाती है।
- मूविंग एवरेज, MACD सिग्नल लाइन को ऊपर से नीचे पार करता है।
नतीजतन, कीमत वास्तव में नीचे चली गई। MACD और बोलिंजर बैंड एक-दूसरे के संकेतों को मजबूत करके ट्रेडिंग को ज्यादा सटीक बनाते हैं। और जटिल इंडिकेटर विश्लेषण के अच्छे उदाहरण हैं। आप इन और अन्य इंडीकेटर का इस्तेमाल ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीतियों और वास्तविक बाजार में कैसे करें, यह मेरे LiteFinance ब्लॉग पर देख सकते हैं।
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प्राइस एक्शन
प्राइस एक्शन या कैंडलस्टिक विश्लेषण आसान होने की वजह से नए ट्रेडर्स के लिए बढ़िया है। ग्राफिकल विश्लेषण की तरह, इसमें भी कुछ पैटर्न शामिल होते हैं, जिससे बाजार में उलटफेर या रुझान जारी रहने का संकेत मिलता है। सिर्फ़ अंतर इतना है कि प्राइस एक्शन पैटर्न सिर्फ़ एक या दो बार या कैंडल्स से बनता है।
उदाहरण के तौर पर, ऊपर दिए चार्ट में नीली मार्क से हैमर जैसी कैंडल का संकेत मिलता है। प्राइस एक्शन सिस्टम पर आधारित टेक्निकल एनालिसिस में, इस पैटर्न से रुझान में उलटफेर का संकेत मिलता है। हमारी स्थिति में, इसका मतलब है कि सुधार जल्द ही समाप्त होने वाला है। नतीजा यह हुआ कि कीमत वास्तव में बढ़ती रही।
आप प्राइस एक्शन के बारे में बहुत कुछ कह सकते हैं, लेकिन इस विषय पर सबसे उपयोगी लेख “फॉरेक्स ट्रेडिंग में कैंडलस्टिक्स और कैंडलस्टिक पैटर्न” है। इसे पढना उपयोगी साबित होता है!
प्रमुख स्तर का विश्लेषण
अगर आप किसी भी चार्ट को ध्यान से देखें, तो आप शायद देखेंगे कि कीमत साइकोलॉजिकल लेवल (जैसे पूर्ण संख्या) या सपोर्ट और रजिस्टेंस लेवल जैसे कुछ खास लेवल पर पहुंचकर रुक जाती है। सपोर्ट और रजिस्टेंस लेवल स्थानीय सबसे उच्चतम और सबसे निम्नकीमत कीमत पर बनते हैं, साथ ही तब भी बनते हैं, जब ट्रेडिंग वॉल्यूम ज्यादा होता है।
इन लेवल की मदद से आप यह जान सकते हैं कि मौजूदा ट्रेंड कितना मजबूत या कमजोर है। अगर रुझान इस लेवल से कम है, पिछली उच्चतम कीमत की संख्या पर निर्भर है, तो कीमत जब इस लेवल के पास पहुंच जाएगी, तो चार्ट में फिर से उलटफेर हो सकता है। वहीं, अगर गिरावट होती है, तो इसका मतलब है कि रुझान मजबूत है और आगे जारी रहने की संभावना ज्यादा है।
आइए ब्रेंट क्रूड ऑयल की प्राइस चार्ट को देखें। हरी लाइन से स्थानीय उच्च स्तर (बाईं ओर नीला निशान) पर बने रजिस्टेंस लेवल का पता चलता है। जब बुलिश ट्रेंड लाल सर्कल वाले एरिया में बना, तो इससे लेवल पार करने, ऊपर की दिशा में बढ़ने की अच्छी संभावना और अगले महीनों में ट्रेंड जारी रहने का संकेत मिलता है। गिरावट के बाद, रजिस्टेंस, सपोर्ट बन गया। यह अगले सुधार में भी साफ तौर पर दिखता है। यह सिर्फ इसी लेवल पर समाप्त हुआ, क्योंकि इसका पोटेंशियल कम था (दाईं ओर नीला निशान)। सिर्फ़ इन प्रमुख लेवल की जानकारी से ही आप ट्रेडिंग शुरू कर सकते हैं।
वॉल्यूम
बाय और सेल ट्रेड के वॉल्यूम से यह पता लगाने में मदद मिलतीहै कि बड़े ट्रेडर्स की दिलचस्पी कितनी है। अगर तेजी या मंदी वाले रुझानों में खरीदारों और विक्रेताओं की गतिविधि ज्यादा या बढ़ रही है, तो इसका मतलब है कि रुझान मजबूत है। वहीं, गतिविधि घटने पर पता चलता है कि रुझान कमजोर है।
साथ ही, वॉल्यूम का इस्तेमाल करके, ट्रेडर स्थिर मूल्य स्तरों की पहचान कर सकते हैं। मान लीजिए कि किसी कीमत की उच्चतम सीमा बनते समय, ट्रेडिंग की मात्रा ज्यादा है, तो यह लगभग निश्चित रूप से मजबूत सपोर्ट या रजिस्टेंस लेवल बनाता है, जिसे भविष्य में पार करना मुश्किल होगा।
ऊपर, डेली Apple स्टॉक चार्ट में, पहले चरण में बुलिश ट्रेंड (नीली रेखा से निशान लगाया गया) बढ़ती ट्रेडिंग एक्टिविटी के साथ दिख रहा है। रुझान समाप्त होने और बड़े ट्रेडर्स की कीमत में बढ़ोतरी में दिलचस्पी कम होने के बाद, वॉल्यूम इंडेक्स गिरने लगा। इसका मतलब है कि ग्रोथ जल्द खत्म होने वाली है। साथ ही, तेजी के रुझान में उलटफेर (कीमत में गिरावट) के समय वॉल्यूम में बढ़ोतरी से बिक्री की पुष्टि होती है।
इलियट वेव थ्योरी
राल्फ नेल्सन इलियट ने इलियट वेव थ्योरी विकसित की। यह लोकप्रिय तकनीकी विश्लेषण का तरीका है, जिसका इस्तेमाल कई ट्रेडर्स करते हैं। इलियट थ्योरी, फाइनेंशियल मार्केट की साइक्लिक प्रकृति, आवर्ती और दोहराने वाले फ्रैक्टल वेव पैटर्न पर आधारित टूल है। इलियट ने इम्पल्सिव और करेक्टिव दो मुख्य प्रकार की वेव के बारे में बताया है। ये दोनों प्रकार लगातार बारी-बारी से बदलते रहते हैं और वेव पैटर्न बनाते हैं। इलियट के अनुसार, अगर मार्केट में पांच वेव का पैटर्न बनता है, तो इसे इम्पल्स कहा जाता है और यह ट्रेंड की दिशा में चलता है। वहीं, तीन वेव का A-B-C पैटर्न सुधार है और यह ट्रेंड के विपरीत दिशा में चलता है।
ऊपर वाले चार्ट में पांच वेव वाला बुलिश पैटर्न और डबल ज़िगज़ैग दिखाया गया है। अगर आप प्राइस चार्ट को इस तरह मार्क करें, तो आप भविष्य की कीमत की दिशा का अंदाजा लगा सकते हैं। फ़िबोनाची रिट्रेसमेंट लेवल से आप यह तय कर सकते हैं कि वेव कहां शुरू और खत्म होंगी।
तकनीकी विश्लेषण के वित्तीय साधन
तकनीकी विश्लेषण में अलग-अलग फ़ंक्शन वाले कई टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें तीन समूहों में बांटा जा सकता है:
- चार्ट: कैंडलस्टिक चार्ट, बार चार्ट, लाइन चार्ट, वॉल्यूम चार्ट, हेइकिन-आशी, आदि।
- चार्ट ऑब्जेक्ट: फिबोनाची ग्रिड और लेवल, ट्रेडिंग चैनल, टाइम ज़ोन, सपोर्ट और रजिस्टेस लेवल, तरंग संरचनाएं, चार्ट पैटर्न।
- इंडीकेटर: ट्रेंड इंडीकेटर, वॉल्यूम इंडीकेटर, ऑसिलेटर, बिल विलियम्स इंडीकेटर, मूविंग एवरेज, और हजारों अन्य तकनीकी टूल।
चार्ट
तकनीकी विश्लेषण में समय के साथ कीमतों में उतार-चढ़ाव दिखाने का सबसे जानकारीपूर्ण तरीका अलग-अलग प्राइस चार्ट है। मैं नीचे सबसे पॉपुलर प्राइस चार्ट के प्रकार के बारे में बताने वाली हूं:
कैंडलस्टिक्स
मैंने ऊपर प्राइस एक्शन के बारे में पहले ही लिखा है, लेकिन कैंडलस्टिक्स चार्ट की संरचना के बारे में नहीं बताया है। यह जापानी कैंडल्स से बना होता है। यह किसी एसेट की कीमत की सही रेंज को खास अवधि, टाइमफ्रेम के लिए दिखाता है। प्राइस चार्ट की एक कैंडल, कीमत में उतार-चढ़ाव को दिखाती है:
- M1 टाइमफ्रेम के लिए एक मिनट से ज्यादा,
- H1 टाइमफ्रेम के लिए एक घंटे से ज्यादा,
- D1 टाइमफ्रेम के लिए 24 घंटे से ज्यादा,
- और इसी तरह, 1M की सबसे लंबे टाइमफ्रेम तक।
उपरोक्त चार्ट जापानी कैंडल बनने के सिद्धांत को दिखाता है। नंबर 1 मौजूदा कीमत की उच्चतम स्तर को दिखाता है, नंबर 2 समापन कीमत, नंबर 3 कैंडल की ओपनिंग और नंबर 4 निम्नतम कीमत को दिखाता है। शुरुआती और समापन कीमत कैंडल बॉडी बनाते हैं। ग्रीन कैंडल बुलिश होते हैं और कीमत बढ़ने को दिखाते हैं, जबकि रेड कैंडल बियरिस होते हैं। इसलिए शुरुआती और समापन कीमत कैंडलस्टिक्स बॉडी बनाती हैं। बियरिस कैंडल में शुरुआती कीमत, समापन कीमत से से ज्यादा होती है और बुलिश में ठीक इसका उल्टा होता है। सबसे उच्चतम और निम्नतम कीमत कैंडल की शैडो या विक्स बनाती है। कैंडलस्टिक बॉडी जितनी लंबी और उसकी शैडो जितनी छोटी होगी, तेजी या मंदी उतनी ही मजबूत होगी।
बार
बार चार्ट, जापानी कैंडलस्टिक्स से मिलता-जुलता है। हरेक बार निश्चित समय के दौरान मूल्य सीमा को दिखाने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा होती है। ऊर्ध्वाधर रेखाओं में दाईं और बाईं ओर छोटी क्षैतिज रेखाएं होती हैं।
जापानी कैंडलस्टिक बॉडी के उच्चतम और निम्नतम बिंदुओं की तरह, बाईं रेखा शुरुआती कीमत को दिखाती है, जबकि दाईं क्षैतिज रेखा बार के समापन कीमत को दिखाती है। केंद्रीय ऊर्ध्वाधर रेखा का शीर्ष बार उच्चतम कीमत को दिखाता है; रेखा का निचला भाग निम्नतम कीमत को दिखाता है। बाकी सभी में, तकनीकी विश्लेषण के दृष्टिकोण से, प्राइस एक्शन के पैटर्न को बार चार्ट में उसी तरह समझा और पढ़ा जाता है, जैसे उन्हें जापानी कैंडल में पढ़ा जाता है।
लाइन
लाइन चार्ट एक प्राइस चार्ट होता है। यह कर्व्ड लाइन में बनता है। इसे पॉइंट के जरिए बनाया जाता है, हर पॉइंट किसी खास समय अवधि की कीमत दिखाता है। उदाहरण के तौर पर, एक मिनट के चार्ट में हर मिनट एक पॉइंट दिखेगा, और एक घंटे के चार्ट में हर घंटे एक पॉइंट बनेगा।
ऐसे चार्ट की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह चुनी गई समय अवधि में कीमत में उतार-चढ़ाव नहीं दिखाता। इसमें सिर्फ यह जानकारी होती है कि आखिरी सेकंड या आखिरी हॉरिजॉन्टल टिक पर कीमत क्या थी। लेकिन यही इसकी एक अच्छी बात भी है, क्योंकि ऐसे चार्ट में गलत जानकारी बहुत कम होती है।
उदाहरण के तौर पर, ऊपर Apple स्टॉक की लाइन चार्ट को दिखाया गया है। यह चार्ट सिर्फ समापन कीमत को दिखाता है, इसलिए ट्रेंड लाइन बनाना और तकनीकी विश्लेषण करना काफीआसान हो जाता है। इस तरह ट्रेंड बदलने का सही समय देखना भी आसान हो जाता है।
एरिया चार्ट
एरिया चार्ट, लाइन चार्ट की तुलना में देखना आसान होता है, क्योंकि इसमें स्थानीय उच्चतम स्तर और निम्नतम स्तर की आसानी से पहचान की जा सकती है। वॉल्यूम चार्ट खासकर उन स्कैल्पर्स के लिए दिलचस्प होता है, जिन्हें प्राइस टिक तक की जानकारी वाले चार्ट का इस्तेमाल करना पसंद है।
साथ ही, इस पर ट्रेंड लाइन, सपोर्ट और रजिस्टेंस लेवल बनाना और अन्य ग्राफिकल टूल्स का इस्तेमाल करना ज्यादा कठिन होता है। उपरोक्त चार्ट से यह पता चलता है कि ये आसानी से चार्ट पर रंगीन चिह्नों के साथ मिल जाते हैं और इन्हें पढ़ना मुश्किल होता है । संरचना के सिद्धांत के अनुसार, एरिया चार्ट, लाइन चार्ट से मिलते-जुलते हैं।
हेइकिन-आशी
हेइकिन-आशी चार्ट देखने में सामान्य जापानी कैंडलस्टिक्स से काफी मिलता-जुलता है। हालांकि, यह भ्रमित करने वाला प्रभाव है, क्योंकि हेइकिन-आशी, सामान्य कैंडलस्टिक पैटर्न चार्ट का संतुलित संस्करण है। यानी यह औसत संकेतक की वास्तविक सीमा दिखाता है। इसे इन पैरामीटर का औसत निकालकर बनाया जाता है:
- ओपन पैरामीटर: पिछले जापानी कैंडलस्टिक के ओपन और क्लोज़ पैरामीटर को जोड़कर प्राप्त राशि को दो से भाग दिया जाता है।
- क्लोज़ पैरामीटर: इस पैरामीटर की गणना मौजूदा बार के बंद होने के तुरंत बाद उसके मान के आधार पर की जाती है। इसमें मूल कैंडल की शुरुआती और समाप्ति कीमत को जोड़कर कुल राशि को चार से भाग दिया जाता है।
- अधिकतम की गणना पिछले कैंडलस्टिक पैटर्न के शुरुआती, समापन और उच्चतम कीमत की तुलना करके की जाती है। फिर इनमें से सबसे उच्चतम मान को चुना जाता है।
- न्यूनतम की गणना उसी तरह की जाती है, लेकिन इसमें सबसे छोटा मान लिया जाता है।
उपरोक्त चार्ट हेइकिन-आशी चार्ट दिखाता है। इसकी व्याख्या के अनुसार, यह जापानी कैंडलस्टिक्स से मिलता-जुलता है। ट्रेडर को यह समझना चाहिए कि संतुलित कैंडलस्टिक पर टेल का मतलब यह नहीं है कि कीमत कभी वहां रही है। हेइकिन-आशी का इस्तेमाल अक्सर इचिमोकू ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति, स्कैल्पिंग और अन्य ट्रेडिंग विधियों में अलग-अलग टिकर के तकनीकी विश्लेषण के लिए किया जाता है। अगर आप हेइकिन-आशी का विस्तार से अध्ययन करना चाहते हैं, तो मैं आपको मेरा ट्यूटोरियल लेख हेइकिन-आशी कैंडल पढ़ने का सुझाव देता हूं।
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इंडीकेटर
तकनीकी विश्लेषण इंडीकेटर ऐसा एल्गोरिदम है, जिनका इस्तेमाल करके ट्रेडर्स पुरानी कीमतों की जानकारी के आधार पर ट्रेडिंग सिग्नल पाते हैं। कई निवेशक अक्सर इन टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। कई निवेशक इन्हें इस्तेमाल करते हैं क्योंकि सिग्नल मिलना आसान है, इन्हें चार्ट के साथ एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है और इनकी भविष्यवाणी की सटीकता भी ठीक होती है।
कीमत पर आधारित इंडीकेटर
यह इंडीकेटर का सबसे व्यापक समूह है। इनका इस्तेमाल कीमतों में भावी उतार-चढ़ाव की दिशा, किसी एसेट की कीमत में बदलाव की दर, ट्रेंड की क्षमता और प्रवेश और निकास का सही समय तय करने के लिए किया जाता है। सभी प्राइस इंडीकेटर की गणना कीमत के पैरामीटर और प्राइस डायनामिक्स पर आधारित होती है।
सबसे लोकप्रिय इंडीकेटर नीचे सूचीबद्ध हैं:
- ADX (एवरेज डायरेक्शन इंडेक्स) का इस्तेमाल किसी दिशात्मक रुझान की गति या स्ट्रेंथ को तय करने के लिए किया जाता है। उच्च मान से मज़बूत रुझान का संकेत मिलता है, चाहे उसकी दिशा कुछ भी हो।
- ADXR (एवरेज डायरेक्शन मूवमेंट इंडेक्स रेटिंग), ADX का संतुलित संस्करण है। इनका इस्तेमाल आमतौर पर मूल संकेतक संकेतों की वैधता का आकलन करने के लिए किया जाता है।
- CCI (कमोडिटी चैनल इंडेक्स) किसी टिकर की वर्तमान दर में बदलाव को उसके औसत इंडिकेटर बदलाव के सापेक्ष दिखाता है। इस इंडीकेटर का इस्तेमाल डायवर्जेंस और कनवर्जेंस, प्रवेश बिंदुओं की पहचान करने या अन्य वित्तीय साधन के संकेतों के लिए फ़िल्टर के रूप में किया जा सकता है।
- कॉपॉक कर्व, स्मूथ्ड सिक्योरिटीज रिटर्न के योग का विश्लेषण करने वाले एल्गोरिथ्म पर आधारित है। यह बाज़ार में कीमत में उतार-चढ़ाव की पहचान करने वाला टूल है, जिसका इस्तेमाल, लचीली सेटिंग की वजह से, ट्रेंडिंग मार्केट और स्थिरता के दौरान किया जा सकता है।
- MA (मूविंग एवरेज) चयनित अवधि की औसत कीमत को दिखाता है।
- MACD (मूविंग एवरेज कनवर्जेंस / डायवर्जेंस)। मूविंग एवरेज एक तरह का ऑसिलेटर इंडीकेटर है, जिससे एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज के कनवर्जेंस/डायवर्जेंस के आधार पर मूल्य रुझान की संभावित दिशा तय करने में मदद मिलती है।
- मोमेंटम इंडीकेटर। यह ऑसिलेटर मौजूदा समय अंतराल के समापन कीमत की तुलना चयनित समय अवधि के समापन कीमत से करता है। मोमेंटम न सिर्फ़ बाजार में कीमत में उतार-चढ़ाव की दिशा, बल्कि उसकी गति भी दिखाता है। अपने संकेतों के संदर्भ में, यह CCI और RSI से मिलता-जुलता है।
- RSI (रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स) टिकर रेट अनुपात में औसत बढ़ोतरी और उसकी औसत गिरावट को दिखाता है। यह प्रमुख इंडीकेटर है। इसकी मदद से आप बाज़ार में प्रवेश के बिंदुओं की पहचान कर सकते हैं। संकेत: ओवरबॉट और ओवरसोल्ड, डायवर्जेंस, चार्ट पैटर्न।
- स्टोकेस्टिक ऑसिलेटर पिछली कीमत के सापेक्ष मौजूदा कीमत की स्थिति को प्रतिशत के रूप में दिखाता है। इससे आपको रुझान में उलटफेर को निर्धारित करने की अनुमति मिलती है।
- ट्रिक्स बहुउद्देश्यीय तकनीकी विश्लेषण टूल है। यह ट्रिपल एक्सपोनेंशियल स्मूथ्ड मूविंग एवरेज से बना होता है। इससे मोमेंटम और भावी रुझान को एक साथ जोड़ने की सुविधा मिलती है। ट्रिक्स सिग्नलों में, कई ट्रेडर्स सिग्नल लाइन क्रॉसिंग और डायवर्जेंस का इस्तेमाल करते हैं।
- W_A/D (विलियम्स एक्यूम्युलेशन/डिस्ट्रिब्यूशन) चार्ट में तेजी के रुझान (खरीदारों के एसेट्स जमा करने की वजह से) और गिरावट के रुझान (प्रतिभूति की बिक्री का परिणाम) को दिखाता है। इस इंडिकेटर का इस्तेमाल खरीदारों की रुचि में बढ़ोतरी और कमी रिकॉर्ड करने के लिए करना सुविधाजनक है। इंडिकेटर चार्ट का इस्तेमाल रुझान की पुष्टि और पहचान करने के लिए किया जाता है। इससे डायवर्जेंस और कुछ चार्ट एनालिसिस पैटर्न की पहचान करने में भी मदद मिलती है।
वॉल्यूम पर आधारित इंडीकेटर
ट्रेडिंग वॉल्यूम इंडीकेटर कीमत और ट्रेडिंग एक्टिविटी में उतार-चढ़ाव पर आधारित होते हैं। इससे दो मुख्य मार्केट इंडीकेटर के बीच निर्भरता या संबंध समझना आसान हो जाता है। ऐसे इंडीकेटर का मुख्य फायदा यह है कि ये पूर्वसूचक होते हैं। सबसे लोकप्रिय वॉल्यूम इंडीकेटर नीचे दिए गए हैं:
- MFI (मनी फ्लो इंडेक्स) एक ऑसिलेटर है, जिससे प्रमुख ट्रेडर की बाज़ार गतिविधि का आकलन करने में मदद मिलती है। इसका एल्गोरिथम खरीद और बिक्री की तीव्रता की गणना करता है। इसके मुख्य संकेत कंडीशनल ओवरबॉट, ओवरसोल्ड लेवल और डायवर्जेंस हैं।
- NVI (नेगेटिव वॉल्यूम इंडेक्स) में सिर्फ़ उस समय होने वाले कीमत के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखा जाता है, जब ट्रेडिंग वॉल्यूम में गिरावट हो रही हो। इसे नेगेटिव वॉल्यूम इंडेक्स भी कहा जाता है। इस इंडीकेटर से मज़बूत खरीद संकेत और अपेक्षाकृत कमज़ोर बिक्री का संकेत मिलता है।
- PVI (पॉज़िटिव वॉल्यूम इंडेक्स), NVI का एक एनालॉग है। यह इंडीकेटर, पॉज़िटिव वॉल्यूम इंडेक्स की गणना करता है। इससे कमज़ोर खरीद संकेत और मज़बूत बिक्री का संकेत मिलता है।
- OBV (ऑन-बैलेंस वॉल्यूम) एक इंडीकेटर है। यह कीमत के रुझान को बखूबी दिखाता है और कभी-कभी उससे पहले भी संकेत मिलता है। इससे किसी तय अवधि में बाजार की गतिविधियों के आधार पर कीमत के उतार-चढ़ाव का पता चलता है।
बाज़ार की व्यापकता
इन इंडीकेटर का समूह टॉप-डाउन विश्लेषण के लिए सबसे उपयोगी है। इनके एल्गोरिदम से ट्रेडिंग से जुड़े वित्तीय साधन और सिक्योरिटीज़ के खास समूह को बेंचमार्क के रूप में ट्रैक करने में मदद मिलती है। इससे आप पूरे बाज़ार की दिशा और विश्लेषित वित्तीय साधन की सापेक्ष गति को समझ सकते हैं।
इस इंडीकेटर ग्रुप का दायरा इतना बड़ा नहीं है। तीन टूल्स खासतौर पर उल्लेखनीय हैं:
- ADL (एडवांस-डिकलाइन लाइन) से यह पता चलता है कि किसी एसेट की कीमत कब बढ़ रही है और कब इसमें गिरावट हो रही है। इसका इस्तेमाल किसी रुझान की मजबूती का आकलन और बाजार में उलटफेर की पहचान करने के लिए किया जाता है।
- आर्म इंडेक्स या TRIN से बढ़ते और घटते स्टॉक्स और उनके वॉल्यूम का हिसाब रखकर ओवरबॉट और ओवरसोल्ड एरिया दिखाने में मदद मिलती है। इस इंडीकेटर से सही समय पर मार्केट में एंट्री करने की पहचान करने में मदद मिलती है।
- McClellan ऑसिलेटर किसी खास अवधि में बढ़ते और घटते स्टॉक की संख्या का विश्लेषण करता है। इस टूल से ओवरबॉट और ओवरसोल्ड जैसे सिग्नल मिलते हैं। साथ ही, ज़ीरो लाइन क्रॉस होने का भी मिलता है।
ओवरले
इन इंडीकेटर से दो मार्केट इंस्ट्रूमेंट (वित्तीय साधन) के बीच के संबंध को समझने में मदद मिलती है और दिखाते हैं कि उनका आपसी असर कितना है। मार्केट विड्थ इंडिकेटर्स की तरह, ओवरले इंडीकेटरसे सबसे संभावनाशील और रोचक एसेट की पहचान करने में मदद मिलती है। साथ ही, कोरिलेशन इंडिकेटर्स का इस्तेमाल हेजिंग ट्रेड और ट्रेंड रिवर्सल की पुष्टि करने में भी होता है। इनमें नीचे दी गई चीज़ें शामिल हैं:
- ओवरले चार्ट का इस्तेमाल ट्रेड किए जाने वाले एसेट में छोटे-छोटे अंतर समझने के लिए किया जाता है। इस संकेतक की खास बात यह है कि इसमें प्राइस चार्ट को एक के ऊपर एक रखा जाता है।
- iCorrelationTable से एक साथ कई करेंसी पेयर के बीच सहसंबंध गुणांक का पता चलता है। इस डेटा का इस्तेमाल करके, निपुण ट्रेडर अलग-अलग करेंसी पेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव का पैटर्न समझकर इसे अपनी ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति के अनुकूल चुन सकते हैं।
- सहसंबंध गुणांक दो चयनित एसेट के बीच -1 से +1 तक के सहसंबंध को दिखाता है। इस इंडीकेटर से सहसंबंध को दृष्टिगत रूप से तय करने में मदद मिलती है। साथ ही स्थिरता, सीजनल पैटर्न और चक्रीय व्यवहार को समझने में भी मदद मिलती है।
चैनल इंडीकेटर
इस तरह के तकनीकी विश्लेषण टूल, प्रमुख स्तर और रुझान की दिशा की पहचान करने के लिए उपयोगी होते हैं और अक्सर इनका इस्तेमाल ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीतियों में स्टॉप लॉस और टेक प्रॉफिट की गणना करने के लिए किया जाता है। चैनल इंडीकेटर से जुड़ी कई लेख और किताबें भी मौजूद हैं। नीचे उनमें से कुछ की खास जानकारी दी गई है, जिससे आपको कुशल ट्रेडिंग निर्णय लेने में मदद मिलेगी:
- बोलिंगर बैंड इंडीकेटर से कीमत की मौजूदा स्थिति को उसकी औसत ट्रेडिंग रेंज के सापेक्ष तय कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल बाज़ार में उलटफेर और मौजूदा रुझान के जारी रहने के संकेतों की पहचान करने के लिए किया जाता है।
- फिबोनाची लाइन, ट्रेंड लाइन बनाने में काम आती है, जिससे फिबोनाची लेवल को आसानी से देखा जा सके। इस इंडीकेटर का इस्तमाल अक्सर ट्रेडिंग से जुड़े लक्ष्यों और पिवट पॉइंट की पहचान करने के लिए किया जाता है।
- इचिमोकू ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति के लिए इचिमोकू क्लाउड लोकप्रिय इंडीकेटर है। इस सार्वभौमिक तकनीकी विश्लेषण टूल से आपको रुझान की दिशा, बाज़ार में प्रवेश और निकास के बिंदु और मूल्य स्तर तय करने की अनुमति मिलती है।
- पैराबोलिक SAR का इस्तेमाल पिवट पॉइंट की पहचान करने और स्टॉप लॉस लगाने के लिए किया जाता है। इस इंडीकेटर में कीमत में उतार-चढ़ाव और समय बीतने जैसे दो कारकों को ध्यान में रखा जाता है।
- पिवट पॉइंट इंडीकेटर छोटे टाइमफ्रेम पर काम करता है। इसे मार्केट में एंट्री पॉइंट, टारगेट और रिस्क समझने के साथ-साथ उन मुख्य लेवल की पहचान करने में मदद मिलती है, जहां कीमत का रुझान बदल सकता है।
- प्राइस चैनल इस्तेमाल करने में आसान और प्रभावी इंडीकेटर है, जिससे निश्चित अवधि में कीमत के निम्न और उच्च स्तर का पता चलता है। ऊपर बताए गए दो मापदंडों के बीच स्थित मध्य वेक्टर से रुझान की दिशा का पता चलता है।
सामान्य शब्द
तकनीकी विश्लेषण का अध्ययन करते समय, आपको कई भ्रामक शब्द मिल सकते हैं। नीचे उन सबसे अहम अवधारणाओं की सूची दी गई है, जिन्हें हर प्रोफेशनल या नए ट्रेडर को समझना चाहिए:
- एवरेज ट्रू रेंज या ATR किसी चुनी हुई अवधि में ट्रेडिंग की कीमत का औसत होता है। इसे अक्सर लाइन इंडीकेटर के रूप में दिखाया जाता है।
- ब्रेकआउट तब होता है, जब कीमत सपोर्ट या रजिस्टेंस लेवल, ट्रेंड लाइन, चैनल बॉर्डर्स, बोलिंगर बैंड या किसी अन्य अहम लेवल को पार कर जाती है। इससे रुझान में तेजी का भी संकेत मिलता है।
- यह वह अवधि होती है, जिसमें कीमत में उतार-चढ़ाव कुछ निश्चित पैटर्न के अनुसार होता है।
- डेड कैट बाउंस तब होता है, जब कीमत थोड़ी बढ़ती है और फिर वापस गिर जाती है। ऐसी स्थिति अक्सर ‘जंक’ एसेट में या तब दिखाई देती है, जब बड़े फंडामेंटल ट्रेडर कीमत बढ़ने का समर्थन नहीं करते।
- डॉव थ्योरी में स्टॉक की कीमतों के समय के साथ बदलने के व्यवहार को समझाया जाता है। इसे डॉव जॉन्स के सह-संस्थापक चार्ल्स डॉव ने विकसित किया था। इसने आधुनिक तकनीकी विश्लेषण के मुख्य सिद्धांत पेश किए, जैसे भावी रुझान को समय और महत्व के अनुसार बांटना, ट्रेंड के चरणों को अलग करना, स्टॉक इंडेक्स की स्थिरता और ट्रेंड का प्रभाव तब तक बने रहना, जब तक उसके खत्म होने के स्पष्ट संकेत न दिखें।
- डोजी ऐसे कैंडल होते हैं, जिनका बॉडी छोटा और शैडो लंबा होता है। यह तब बनता है, जब मार्केट में ट्रेडर्स को यह नहीं पता होता कि कीमत किस दिशा में जाएगी।
- इलियट वेव थ्योरी, मार्केट की गतिविधियों को वेव पैटर्न के ग्राफिकल सिस्टम के जरिए समझाने का तरीका है।
- फिबोनाची अनुपात "गोल्डन रेशियो" नियम पर आधारित होते हैं। हरेक अगली फिबोनाची संख्या का अनुपात 1.68 के आस-पास होता है।
- हार्मोनिक पैटर्न ऐसा ट्रेडिंग सिस्टम है, जिसे एच.एम. गार्टले ने बनाया है और यह बार-बार दोहराए जाने वाले प्राइस पैटर्न और फिबोनाची अनुपात का उपयोग करके पिवट पॉइंट को निर्धारित करने के सिद्धांतों पर आधारित है।
- मोमेंटम एक तकनीकी इंडीकेटर है, जिससे कीमत में उतार-चढ़ाव की तीव्रता को मापा जाता है।
- प्राइस एक्शन एक ट्रेडिंग सिस्टम है, जिससे किसी इंडीकेटर के बिना साफ़ चार्ट पर ट्रेडिंग के अवसर की पहचान करने में मदद मिलती है। यह कैंडलस्टिक पैटर्न के विश्लेषण पर आधारित है।
- सपोर्ट वह स्तर है, जहां खरीदार अपट्रेंड बनाए रखने की कोशिश करते हैं और सेलर डाउनट्रेंड बनाए रखने की कोशिश करते हैं।
- रजिस्टेंस वह स्तर है, जहां खरीदार बाजार की गिरावट रोकने की कोशिश करते हैं और विक्रेता बाजार की तेजी रोकने की कोशिश करते हैं। सपोर्ट और रजिस्टेंस खास कीमत पर दिखाई देते हैं।
- रुझान वह दिशा है, जिसमें कीमत समय के साथ आगे बढ़ती है।
- पुलबैक या सुधार मुख्य रुझान के विपरीत दिशा में कीमत में अस्थायी उतार-चढाव है।
तकनीकी विश्लेषण के फ़ायदे
आइए तकनीकी विश्लेषण के फ़ायदे पर एक नज़र डालें:
लोकप्रियता
लगभग सभी ट्रेडर्स तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल करते हैं और इसे डेवलप भी करते हैं। इंडीकेटर और ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीतियां लगातार बेहतर होती जा रही हैं। कई सामग्री और तकनीकी विश्लेषण विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, इसलिए आप सभी सवालों के जवाब और सुझाव पा सकते हैं।
आसानी से उपयोग
अक्सर, तकनीकी विश्लेषण टूल्स और दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होते हैं। तकनीकी विश्लेषण टूल्स और तरीके फंडामेंटल एनालिसिस की तुलना में सीखने और महारत हासिल करने में आसान हैं।
बहु-उपयोगिता
तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल हर जगह किया जा सकता है। यह फॉरेन एक्सचेंज मार्केट, CFD, मेटल और कमोडिटी मार्केट पर समान रूप से प्रभावी है और इससे क्रिप्टोकरेंसी, सिक्योरिटीज़ और इंडेक्स की कीमतों में उतार-चढ़ाव की भविष्यवाणी करने में मदद मिलती है।
टाइमफ्रेम की विस्तृत श्रृंखला
तकनीकी विश्लेषण (TA) का इस्तेमाल किसी भी टाइमफ्रेम पर किया जा सकता है। अगर मौलिक विश्लेषण सिर्फ़ मासिक चार्ट पर ही प्रभावी होता है, तो तकनीकी विश्लेषण से ट्रेडर को टिक चार्ट पर भी पूर्वानुमान लगाने की अनुमति मिलती है।
ऑटोमेशन
फंडामेंटल एनालिसिस के विपरीत, तकनीकी विश्लेषण के आधार पर कई ट्रेडर्स ऑटोमेटिक ट्रेडिंग रणनीतियां, सिस्टम और बॉट बना सकते हैं और इन्हें ट्रेडिंग की पुरानी जानकारी के आधार पर और रियल-टाइम में बैकटेस्टिंग कर सकते हैं।
तकनीकी विश्लेषण के नुकसान
फायदे के अलावा, तकनीकी विश्लेषण के कई नुकसान भी हैं।
मुख्य नुकसान निम्नलिखित हैं:
व्यक्तिगत दृष्टिकोण
तकनीकी विश्लेषण पिछली कीमत में उतार-चढ़ाव के विश्लेषण और भविष्य की व्याख्या पर आधारित है। ट्रेडर अतीत के पैटर्न देखकर फैसला लेते हैं और सोचते हैं कि ये पैटर्न आगे भी दोहराए जाएंगे। इस दृष्टिकोण के कारण, नए ट्रेडर को भविष्य जानने का गलत भ्रम हो सकता है, जो बड़ी गलती है। तकनीकी विश्लेषण पर आधारित सभी ट्रेडिंग फैसले सिर्फ अनुमान और मूल्यांकन पर आधारित होते हैं।
कम सटीकता
तकनीकी विश्लेषण टूल का इस्तेमाल करके काम करने वाले कोई भी अनुभवी तकनीकी विश्लेषक आपको बताएंगे कि सटीकता में सुधार के लिए अलग-अलग टूल सहित जटिल विश्लेषण का इस्तेमाल करना ज़रूरी है। तकनीकी विश्लेषण की कोई भी तकनीक या टूल से ऐसा कोई सटीक पूर्वानुमान नहीं मिलता है, जो ट्रेडिंग से जुड़े प्रभावी निर्णय के लिए जरूरी हो।
विलंब और त्रुटि की समस्या
सभी तकनीकी विश्लेषण के इंडीकेटर दो तरह के होते हैं, जैसे कि लैगिंग और लीडिंग। लैगिंग इंडिकेटर्स ज़्यादा सटीक होते हैं, लेकिन उतने प्रभावी नहीं होती, क्योंकि ये संकेत बाद में देते हैं। वहीं, लीडिंग इंडीकेटर से समय से पहले संकेत मिलता है, लेकिन इनमें गलत संकेतों की संभावना ज्यादा होती है। ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीति बनाते समय, हर ट्रेडर को अंतराल कम करने और संकेतों की गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
विविधता
तकनीकी विश्लेषण के इतने सारे टूल्स हैं कि सही टूल का चुनाव करना मुश्किल हो जाता है। सभी मौजूदा तरीकों को थोड़े समय में सीख पाना संभव नहीं है। तकनीकी विश्लेषण टूल्स हर दिन डेवलप हो रहे हैं। उनकी सूची सिर्फ़ बढ़ती ही जा रही है। कई नए ट्रेडर्स सबका थोड़ा-थोड़ा इस्तेमाल करते हैं और किसी एक तकनीक में माहिर हुए बिना ही दूसरे टूल पर चले जाते हैं। नतीजतन, निवेश में गलतियां, वित्तीय नुकसान और तकनीकी विश्लेषण में निराशा होती है।
निष्कर्ष
तकनीकी विश्लेषण में भावी रुझानों और बाजार में उतार-चढ़ाव की सही भविष्यवाणी करने के लिए काफी टूल्स उपलब्ध हैं। छोटे टाइमफ्रेम में इसका कोई विकल्प नहीं है। साथ ही, तकनीकी विश्लेषण सबसे प्रभावी तब होता है, जब इसे अन्य मार्केट एनालिसिस तकनीक के साथ इस्तेमाल किया जाए, जैसे कि चार्ट पैटर्न और इंडिकेटर्स। सबसे अनुभवी ट्रेडर्स इसे कम से कम फंडामेंटल एनालिसिस के साथ उपयोग करते हैं। साथ ही, यह समझना जरूरी है कि तकनीकी विश्लेषण खुद में व्यावहारिक रूप से व्यापक है। ऐसे ट्रेडर जो तकनीकी विश्लेषण में विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं और सही विश्लेषण करना चाहते हैं, उन्हें लंबे समय तक कड़ी पढ़ाई और अभ्यास के लिए तैयार रहना होगा। इसका कोई त्वरित समाधान नहीं है। पंद्रह साल के अनुभव वाला ट्रेडर और एनालिस्ट होने के बावजूद, मैं इसकी पहचान करने में सफल नहीं हो पाया। अगर आप इसमें सफल होते हैं, तो कृपया अपने अनुभव कमेंट सेक्शन में साझा करें।
तकनीकी विश्लेषण से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तकनीकी विश्लेषण में ऐसे तरीके शामिल हैं, जिससे कीमत में उतार-चढ़ाव की जानकारी के आधार पर बाजार के रुझान का पूर्वानुमान लगाने में मदद मिलती है। यह तकनीकी इंडीकेटर पर आधारित है: कीमतों की जानकारी, चार्ट की दिशा और उसकी गति, और पूरी हुई ट्रेडों की मात्रा। TA की मदद से ट्रेडर्स रुझान की पहचान कर सकते हैं और बाजार के व्यवहार, कीमतों के पैटर्न, सेंटीमेंट, अहम स्तर, एंट्री पॉइंट और सेलिंग पोजीशन तय कर सकते हैं।
जब आप तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल करना सीखने के लिए अलग सलाह चाहते हैं, तो सबसे पहले इसके मूल सिद्धांत समझें और इसे अपनी परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार अपनाएं। जॉन जे. मर्फी की किताब "वित्तीय बाजारों का तकनीकी विश्लेषण" पढ़ें। इन सुझावों का व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल करें, कैंडलस्टिक के संकेतों और पैटर्न की जानकारी का अध्ययन करें और वित्तीय विश्लेषण का चार्ट बनाएं। रुझान की पहचान करना सीखें!
मूल तकनीक यह है कि सबसे पहले कीमत में उतार-चढ़ाव की मौजूदा दिशा यानी ट्रेंड का पता लगाएं। तकनीकी विश्लेषण की शुरुआत उच्च टाइमफ्रेम से करें और धीरे-धीरे निचले टाइमफ्रेम पर जाएं। प्रमुख स्तर निर्धारित करने और ट्रेडिंग वॉल्यूम का विश्लेषण करने से आपको बाजार समझने में मदद मिलेगी। इसके बाद आप चार्ट और कैंडलस्टिक तकनीकी विश्लेषण कर सकते हैं, यानी संभावित पैटर्न की पहचान करने के लिए ट्रेडिंग चार्ट का अध्ययन कर सकते हैं। नतीजन, हर टाइमफ्रेम का अध्ययन करके और अपनी परिस्थितियों के अनुसार, आप प्रभावी ट्रेडिंग प्लान तैयार कर पाएंगे।
लगभग सभी ट्रेडर्स किसी न किसी रूप में तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ़ लंबे समय के निवेशक ही तकनीकी विश्लेषण को छोड़ सकते हैं। जैसे-जैसे टाइमफ्रेम छोटा होता है, फंडामेंटल एनालिसिस की प्रभावशीलता कम हो जाती है, और डे ट्रेडिंग या स्कैल्पिंग करते समय, तकनीकी विश्लेषण का कोई विकल्प नहीं होता है।
तकनीकी विश्लेषण बाजार के मनोविज्ञान और प्रतिभागियों के व्यवहार पैटर्न के अध्ययन पर आधारित होता है। ट्रेडर्स का हर डर और उम्मीद सीधे-सीधे कीमत में दिखता है। तकनीकी विश्लेषण से आपको यह समझने में मदद मिलती है कि ज्यादातर ट्रेडर्स क्या सोच रहे हैं। तकनीकी विश्लेषण और क्लासिकल इंडिकेटर्स के व्यापक इस्तेमाल की वजह से कई ट्रेडर्स एक ही समय में एक जैसे सिग्नल पा सकते हैं, जिससे बाजार के रुझान पर असर पड़ता है और पूर्वानुमान सही साबित होता है।
इन तरीकों की आपस में तुलना करना मुश्किल होता है, क्योंकि इसमें मार्केट रिसर्च से जुड़े अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। मौलिक तकनीकी विश्लेषण लंबे टाइमफ्रेम में प्रभावी होत है, क्योंकि लंबे टाइमफ्रेम में ज़रुरी मौलिक करक के असर साफ दिखते हैं, रिपोर्ट बेहतर तरीके से जारी की जाती हैं। वहीं तकनीकी विश्लेषण किसी भी टाइमफ्रेम में प्रभावी होता है और मौलिक विश्लेषण के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
तकनीकी विश्लेषण सभी मार्केट में एक ही सिद्धांत पर प्रभावी होता है। यह पिछली कीमत और ट्रेडिंग वॉल्यूम के विश्लेषण पर आधारित होता है।
तकनीकी विश्लेषण की ज्यादा लोकप्रियता और व्यापक इस्तेमाल से इसके भरोसेमंद पूर्वानुमान टूल होने की पुष्टि होती है। लेकिन, सबसे अच्छी तकनीकी विश्लेषण आधारित ट्रेडिंग से जुड़ी रणनीतियां और सिस्टम भी 100% सटीकता की गारंटी नहीं दे सकते। असल में, ट्रेडर की सफलता सिर्फ तकनीकी विश्लेषण की सटीकता पर नहीं, बल्कि पैसे और जोखिम को प्रबंधित करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करती है।
तेजी वाले रुझान के दौरान, ट्रेंडलाइन स्थानीय निम्नतम स्तरों पर खींची जाती है, ताकि चार्ट का आरोही भाग इसके ऊपर रहे। मंदी की कीमत के रुझान के लिए ट्रेंडलाइन दो स्थानीय उच्चतम स्तरों पर खींची जाती है, ताकि चार्ट का अवरोही हिस्सा इसके नीचे रहे। ट्रेंड पर भरोसा करने के लिए, मार्क की गई लाइन से कम से कम एक बार प्राइस रिबाउंड होने तक पुष्टि का इंतजार करें।
सबसे आम TA टूल्स में चार्ट पैटर्न, प्राइस एक्शन कैंडलस्टिक पैटर्न, इलियट वेव थ्योरी और अलग-अलग इंडीकेटर शामिल हैं। इससे ट्रेडर्स को अपने ट्रेड के एंट्री और एग्ज़िट पॉइंट तय करने में मदद मिलती है। ट्रेंड एनालिसिस, सपोर्ट और रजिस्टेंस लेवल को भी ध्यान में रखना चाहिए। यह टूल उन ट्रेडर्स के लिए ज़रूरी है, जो खुद अपने निर्णय लेना चाहते हैं।
तकनीकी विश्लेषण कई तरह के होते हैं:
- चार्ट विश्लेषण से रिवर्सल पैटर्न की पहचान करने में मदद मिलती है।
- इंडिकेटर एनालिसिस से मार्केट को समझने में मदद मिलती है। इसमें तैयार स्क्रिप्ट का इस्तेमाल होता है, जो प्राइस चार्ट पर या अलग विंडो में दिखते हैं।
- प्राइस एक्शन, कैंडलस्टिक पैटर्न पर आधारित होता है।
- वॉल्यूम या ट्रेडिंग से जुड़ी गतिविधि का विश्लेषण।
- इलियट वेव थ्योरी।
- ट्रेंड एनालिसिस और सपोर्ट और रजिस्टेंस लेवल का निर्धारण।
मान लीजिए कि साल 2021 में EURUSD चार्ट पर स्थिर या साइडवेज़ ट्रेंड बन गया है। मार्केट के नियमों के अनुसार, किसी भी समय कीमत स्थिर या संतुलित नहीं रह सकती। साइडवेज़ ट्रेडिंग चैनल स्थानीय उच्च स्तर लगभग 1.23 और निम्न स्तर लगभग 1.17 USD से तय होता है। जब कीमत तय सीमा के बाहर तेज़ी से निकल जाए और फिर वापस आकर उस सीमा को छूए, तो ट्रेड खोलने का मौका मिलता है। इस स्थिति में, भावी रुझान और मार्केट की दिशा का अनुमान लगाना और ट्रेड खोलना संभव होगा।
हरेक प्रकार का तकनीकी विश्लेषण अपने फीचर के अनुसार काम करता है। उदाहरण के तौर पर, प्राइस एक्शन से आपको रिवर्सल की शुरुआत के बाद तुरंत भविष्यवाणी करने की अनुमति मिलती है। हालांकि, कई तकनीकी इंडीकेटर से परिणाम बाद में मिलते हैं, लेकिन ये ज्यादा सटीक होते हैं। इसलिए, बेहतर है कि कई प्रकार के तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल एक साथ किया जाए, ताकि कई स्रोतों से संकेत मिले और पूर्वानुमानों की सटीकता बढ़े।
तकनीकी विश्लेषण तीन स्थितियों में प्रभावी नहीं होता है:
- गलत वित्तीय साधन चुना गया है या उसका इस्तेमाल सही तरीके से नहीं किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, मूविंग एवरेज से भविष्य में बाज़ार की दिशा के अनुसार खरीदने या बेचने का सही संकेत मिल सकता है। लेकिन जब बाज़ार साइडवेज ट्रेंड में होता है, तो इससे कई बार गलत संकेत मिल सकता है।
- विश्लेषित एसेट कम तरल और अत्यधिक अस्थिर होते हैं। अगर किसी एसेट का ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत कम है, तो उसकी कीमत अव्यवस्थित और अस्थिर तरीके से विस्तृत दायरे में ऊपर-नीचे हो सकती है या लंबे समय तक स्थिर रह सकती है। आमतौर पर, ऐसे ट्रेडिंग एसेट के चार्ट का विश्लेषण कम सटीकता के साथ किया जाता है और किसी एसेट की कीमत में अनियमित रूप से उतार-चढ़ाव होता है और तकनीकी विश्लेषण के सभी सामान्य नियमों के विपरीत जा सकती है।
- जिस एसेट का विश्लेषण किया जा रहा है, उसका विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त पिछला ट्रेडिंग डेटा उपलब्ध नहीं है। तकनीकी विश्लेषण (TA) अतीत की घटनाओं को भविष्य पर लागू करने पर आधारित है, इसलिए अगर ट्रेडिंग का पर्याप्त रिकॉर्ड न हो, तो तकनीकी विश्लेषण की अधिकांश विधियां असरदार साबित नहीं होती हैं। किसी एसेट का कई सालों का ट्रेडिंग रिकॉर्ड होना चाहिए और अगर दशकों का हो, तो तकनीकी विश्लेषण और भी भरोसेमंद माना जाता है।
करेंसी पेयर के चार्ट पर रिसर्च की शुरुआत सामान्य बाज़ार भावना, रुझान और प्रमुख स्तरों की पहचान करके करनी चाहिए। दूसरे चरण में यह समझना ज़रूरी है कि मौजूदा रुझान किस चरण में है। क्या वह अभी शुरुआत चरण में है या अपने आखिरी चरण के करीब पहुंच चुका है? इसके बाद यह तय करना ज़रूरी है कि किन स्थितियों में रुझान जारी रहेगा और किन स्थिति में रुझान में उलटफेर होगा और यहां कौन-से कैंडलस्टिक पैटर्न बन सकते हैं। यही आपके किसी भी करेंसी पेयर के साथ काम करने का आधार होगा। अंतिम चरण में संभावित लाभ और हानि का निर्धारण करें। सबसे अच्छे एंट्री पॉइंट कौन-से हैं? और अगर योजना के अनुसार चीज़ें न हों, तो कहां से बाहर निकलना चाहिए? आखिर में, इन सभी जवाबों को ट्रेडिंग प्लान में लिख लें और उसका पालन करें।

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